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Tuesday, 26 July 2011

MHSS

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From: akvashokbindu@gmail.com <akvashokbindu@gmail.com>
To: <akvashokbindu@yahoo.in>
Date: मंगलवार, 26 जुलाई, 2011 11:07:00 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: MHSS

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From: akvashokbindu@gmail.com <akvashokbindu@gmail.com>
To: <fareedansarispn@gmail.com>
Date: मंगलवार, 26 जुलाई, 2011 11:00:51 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: MHSS

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From: akvashokbindu@gmail.com <akvashokbindu@gmail.com>
To: "manojsaxena541@gmail.com" <manojsaxena541@gmail.com>
Date: मंगलवार, 26 जुलाई, 2011 10:54:45 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: MHSS

MHSS यानि कि मानवता हिताय सेवा समिति!


चेतनांशों की सेवा ही ईश की स्थूल आवश्यक भक्ति है.जाति ,सम्प्रदाय ,धर्मस्थल ,आदि के लिए जीने वालों से खुश रहने वाले देवी देवताओं से ऊपर उठ सिर्फ- ओ3म आमीन !

जय कुरुशान(गीता) जय कुरआन !

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Sunday, 24 July 2011

23जुलाई:मंत्री सत्यपाल यादव की पुण्यतिथि

कल मीरानपुर कटरा शाहजहांपुर के सिउरा ग्राम स्थित चेतराम सिंह इण्टर कालेज मेँ सपा व विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं व पब्लिक के बीच सपा मुखिया मुलायम सिंह के भतीजे धर्मेन्द्र यादव ने वर्तमान मायावती व मनमोहन सिंह सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि आज देश व प्रदेश मेँ गुण्डागर्दी का माहौल है.


मैं भी अपने कुछ कार्यकर्ताओं (मुझ द्वारा संस्थापित मानवता हिताय सेवा समिति के सहयोगी) के साथ उपस्थित था.मैं सोंचने लगा कि यह मंत्री जी का पुण्य तिथि समारोह है कि राजनैतिक ......?!

खैर...


मुझमेँ मंत्री सत्यपाल यादव के प्रति श्रद्धा रही है और श्रद्धा रहेगी.मैं वहां इस लिए नहीं गया था कि सपा के प्रति लगाव है.मुझे कि राजनैतिक पार्टी से लगाव नहीं हैं क्योंकि हमेँ तो हर पार्टी कुप्रबन्धन भ्रष्टाचार व गुटवाजी मेँ सहयोगी नजर आ रही है.
हम देखते हैं कि कोई नेता विधायक एमपी नहीं बन पाता इससे पूर्व उसके गांव व बिरादरी के लोग गुटवाजी व मनमानी के हिमायती हो जाते है.पुलिस की नजदीकियों की तरह इनके नजदीक भी सच्चे व ईमादार लोग नजर नहीं आते.ये लोग भी पब्लिक के साथ न्याय नहीं कर पाते.


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कथाकार तेजेन्द्र शर्मा : आज के समय के महान कथाकार.

कौन साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा नाम की शख्सियत से परिचित न होगा? वे कथा साहित्य के जगत के आधुनिक नक्षत्र हैँ . अप्रैल 1999ई के बाद मेरा उनसे कोई पत्र व्यवहार न हो सका. 02अप्रैल1999ई को उनके द्वारा मुझे सम्बोधित करते हुए एक पत्र लिखा गया था .इस पत्र के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ था कि वे सदा के लिए अपना निवास लन्दन मेँ बना लिए हैं.अब बस इण्टरनेट की कुछ साइटों के माध्यम से उनसे सम्बन्धित खबरें मिल जाती हैं.


विदेश मेँ रह कर भी वे किस तरह हिन्दी साहित्य की सेवा मेँ लगे हैं,यह सराहनीय कदम है.

शेष फिर .....


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Sunday, 17 July 2011

गौरवशाली भारत का गौर�� दलित पिछड़ोँ के पूर्व���ों के हाथ ...?!

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From: Akvashokbindu <akvashokbindu@gmail.com>
To: <akvashokbindu@yahoo.in>
Date: गुरुवार, 14 जुलाई, 2011 6:53:21 अपराह्न GMT+0530
Subject: गौरवशाली भारत का गौर�� दलित पिछड़ोँ के पूर्व���ों के हाथ ...?!

पिछड़ी जाति के हमारे एक मित्र हैं.जो आज के क्षत्रियों को लेकर बड़े खिन्न रहते हैं.वे कहते हैं कि इन क्षत्रियों को पिछड़ी व दलित जाति का इतिहास जानने की जरुरत नहीं है.विहिप अध्यक्ष अशोक सिंघल की एक पुस्तक लिखती है कि दलित व पिछड़ी कही जाने वाली कभी क्षत्रिय हुआ करती थीँ.वर्मा क्षत्रियों की प्राचीन उपाधी थी.आज की सिंह उपाधि का इतिहास एक हजार वर्ष से पुराना नहीं है.इससे पहले किन किन उपाधियों का प्रयोग किया जाता था?जिन उपाधियों का प्रयोग किया जाता था,उन उपाधियों को धारण करने वाले क्या आज दलित पिछड़ी जाति में नहीँ जी रहे?ऐ आज के क्षत्रियों व ब्राहमणों जरा भागवत पुराण,आदि में वर्णित वंशावलियों पर अनुसंधान तो कराओ.एक ही राजा के चार पुत्र होते हैं,एक से जो वंश चलता है वे ब्राहमण कहलाते हैँ,एक से जो वंश चलता है वे क्षत्रिय कहलाते हैँ.उस वक्त जाति नहीं वर्ण व्यवस्था थी.सात सौ वर्ष पहले का इतिहास आज के दलित व पिछड़ों के पुरखोँ के हाथ में था ही,वाद के भी कुछ राजाओं की वंशावलिया खंगालने से पता चलता है कि वे आज की दलित पिछड़ी जाति के पूर्वज थे.इन पन्द्रह सौ वर्षों का इतिहास हाँ हजूरी,चापलूसी,आपसी द्वेष व फूट,आदि का इतिहास है.क्षत्रिय महासभा मेँ महाराणा प्रताप ,श्री कृष्ण,शिवा जी,आदि को क्षत्रिय मान कर सम्मान देने वाले जरा अन्वेषण तो कराये कि इनके भाई बन्धु व परिजन क्या आज के दलित पिछड़ों के पूर्वज नहीं थे.आज की आदिवासियों,जनजातियों का जरा इतिहास तो खंगाल कर देखिये.आज के वाल्मिकियों का इतिहास खंगालने की कोशिस तो कीजिए.आज के यादवोँ,कुर्मियों,कुशवाहों,मौर्यों ,आदि का इतिहास तो खंगालने की कोशिश तो कीजिए.


प्राचीन काल में क्षत्रियों की एक उपाधि थी-वर्मा या वम्मा.अभी चन्द दिनों पहले से पद्मानाभस्वामी मंदिर चर्चे में है.त्रावणकोर राज्य को स्वर्णिम राज्य बनाने बालों के वंशज आज कौन हैं?मौर्य साम्रज्य को खड़ा करने वाले ,गुप्त वंश ,चोल,आदि वंश के लोग आज कहाँ है?आज से पन्द्राह सौ वर्ष पहले के राजवंशों के वंशी क्या आज के क्षत्रियों में स्थान पाये है?महाभारत काल मेँ तक की जन जातियां महाभारत के अनुसार क्षत्रिय ही थे.

Friday, 15 July 2011

यज्ञ व सगुण परिपाटी म��ँ निर्गुण आर्यत्व

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From: Akvashokbindu <akvashokbindu@gmail.com>
To: <akvashokbindu@yahoo.in>
Date: गुरुवार, 14 जुलाई, 2011 11:09:41 पूर्वाह्न GMT+0530
Subject: यज्ञ व सगुण परिपाटी म��ँ निर्गुण आर्यत्व

प्राचीन योरोप साहित्य मेँ एक शब्द है-सील.जो अंग्रेजी के सी,आई,ई व एल अक्षर से मिल कर बना है.जिसका अर्थ है-स्वर्ग या आकाश.योरोप की पुस्तकों में भी स्वर्ग के परिपेक्ष्य मेँ कश्मीर तिब्बत और चीन के कुछ भाग की ओर संकेत किया गया है.भारतीय ग्रन्थों मेँ भी स्वर्ग के लिए कश्मीर तिब्बत की ओर संकेत मिलता है.योग और ध्यान के परिपेक्ष्य मेँ तिब्बत एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इस सम्बंध मेँ वह काफी युगों से अग्रणी है.प्रथम सभ्य मनुष्यों का केन्द्र भी तिब्बत माना जाता है.स्वर्गपुत्र या निर्गुण पुत्र या आर्य या देवता इसी भू भाग से सम्बन्ध रखते हैँ.इस भूभाग को ब्रह्म देश भी कहा गया है.ये स्वाध्याय अर्थात आत्मसाक्षात्कार को विशेष महत्व देते थे.
साधारण मनुष्य कर्मकाण्डों में व्यस्त रहे लेकिन कुछ ही वास्तव में मनप्रबन्धन से जुड़ अध्यात्म व अत्मसाक्षात्कार से जुड़े रहे हैँ.सभ्य मनुष्यों अर्थात आर्यों का प्रभाव पहाड़ों से आकर धरती पर हुआ तो ये धरती पर स्वर्गपुत्र(आकाश पुत्र या ईश्वरपुत्र)कहलाने के साथ धरती के मनुष्यों के लिए सम्माननीय बन गये क्योंकि पहाड़ों से उतरे ये लोग ज्ञान के क्षेत्र मेँ काफी आगे थे...और इन लोगों के मैदानी जनों से संघर्ष भी हुए.इन पहाड़ी जनों के मैदानी प्रसंशक शमन धर्म के कहलाये.योग को महत्वपूर्ण स्थान देने के साथ यह दमन के स्थान पर शमन को महत्व देते थे.इन्हीँ शमन धर्मियों मेँ कश्यप ऋषि ,चन्द्र(सोम),शुक्राचार्य,और्ब,आदि जैसे व्यक्तित्व उभर कर आये.आगे चल कर यही सोमी कहलाये.


एक ओर आत्मसाक्षात्कार दूसरी ओर साधारण जन मेँ यज्ञ को महत्व देने वाले व प्रकृतिअनुशीलन तथा प्रकृतिक घटनाओँ से भयभीत लोग ईश्वर की स्थूल कल्पना में खो गये.ऋग्वैदिक शब्द 'यल्ह'जिसे ईश्वर व यज्ञ दोनों के लिए प्रयोग किया गया,मात्र ईश्वर के लिए प्रयोग किया जाने लगा.पितर पूजा को महत्व के साथ पहाड़ों से उतरे प्रथम जनों को मैदानों में,विशेष रुप से अरब क्षेत्र में मूर्ति बना कर पूजा जाने लगा.सोमी के ही एक इब्राहिम बुतपरस्ती के कारण पैदा हुए विकारों को देख परेशान हो उठे,जो निर्गुण के सगुण रुप से परेशान हो उठे.मनप्रबंधन से हट कर लोग सिर्फ स्थूल प्रबंधन में लीन थे.उन्होने देखा कि लोग कैसे बुतपरस्ती मेँ योग ध्यान आत्मसाक्षात्कार एवं धार्मिकता(धर्म या सम्प्रदाय नहीँ)से दूर होते जा रहे हैँ.इब्राहिम के पुत्र इसहाक की पीढ़ी मेँ हजरत दाऊद व हजरत मूसा पैदा हुए,हजरत मूसा व दाऊद को मानने वाले यहूदी कहलाये.हजरत मूसा ने यज्ञ में पशु बलि की महत्ता को बनाये रखा.बुतपरस्ती,यज्ञ में बलि एवं अन्य अव्यवस्थाओं ने इधर जैन व बुद्ध को पैदा कर दिया था.उधर सीरिया क्षेत्र मेँ ईसा मसीह.इब्राहिम के दूसरे पुत्र इस्माइल की पीढ़ी में हजरत मोहम्मद पैदा हुए.अरब मेँ बुतपरस्ती व अन्य विषमताओं के खिलाफ उठ खड़े हो हजरत मोहम्मद ने निर्गुण धारा मेँ जान डालने के लिए आर्यत्व संभाला.हजरत मोहम्द प्रतिवर्ष रमजान का मास सपरिवार हीरा की गुफा में ध्यानस्थ हो बिताते थे.जहां ही उन्हेँ इलहाम हुआ अर्थात उनके लिए यल्ह(इलाह)एक आम बात हो गयी अर्थात वे ईश्वरत्व से जुड़ गये.

सनातन धर्म यात्रा के पथ पर प्रखर प्रहरी कितने होते है? जीवों मेँ चेतना के दोनों अंश-परमांश व प्रकृतिअंश प्रति समदृष्टि रखते हुए शरीफ व ईमानदार होने को यदि किसी सम्प्रदाय के व्यक्ति अपने अपोजिट मान लेँ तो इसमेँ किसका दोष है?जाति ,मजहब,आदि के नाम पर मन में द्वेष भाव रखने वाले कदापि अपने ईमान के पक्के नहीं हो सकते.अपने जाति सम्प्रदाय से निकल कर जो मानव व प्रकृति प्रति दया व सेवा भाव नहीं होता वे कैसे सनातन धर्म यात्रा के प्रखर प्रहरी हो सकते हैं?परमात्मा व प्रकृति के विरुद्ध जा कर स्वधुन व निर्जीव वस्तुओं को ज्यादा महत्व देना ईमान नहीं है.

द अफ्रीकन

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From: Akvashokbindu <akvashokbindu@gmail.com>
To: <akvashokbindu@yahoo.in>
Date: बुधवार, 13 जुलाई, 2011 7:12:36 अपराह्न GMT+0530
Subject: द अफ्रीकन

भूमध्य सागरीय आदिमानव! क्रीट सभ्यता एवं अफ्रीका का इतिहास.....

दूसरी ओर एक मार्डन फैमिली,जिसमेँ एक युवती .....उम्र उसकी तीस वर्ष.


उसकी महत्वाकांक्षा कि मैं चाहती हूँ सारी दुनियां मेरी मुटठी में हो और वो (जीवनसाथी)जो हो ,उसके लिए मैं ही सारी दुनियां होऊँ.मेरे सिवा सारी दुनिया को वह भूल जाए.


इस युवती को जंगलों में जाकर विभिन्न औषधियों व वनस्पतियों के बारे में जानकारी एकत्रित करने का शौक था.वह एक मेडिकल इंस्टीटयूट मेँ कार्यरत थी.लेकिन इस वक्त वह अफ्रीका के जंगलों मे थी...


दूसरी ओर एक मनोचिकित्सालय.....एक पागल एक रुम में था,उसने कुछ चित्र बना डाले थे-
एक चित्र में भूमध्यसागरीय क्षेत्र, दूसरे मेँ संसार तीसरे मेँ पृथ्वी ,चौथे में एक आकाशीय पिण्ड ,पाँचवें मेँ एक अन्तरिक्ष यान .....


उस पागल ने अपनी आंखे बन्द कर रखी थीं.


क्या वह वास्तव मेँ पागल था-


अन्तरिक्ष मेँ एक यान!


एक स्क्रीन पर मनोचिकित्सालय के चलचित्र!उस पागल की तश्वीरें भी.....

"यह पागलखाने मेँ!"


"पृथु की धरती के हाल क्या है?कैसे बयां करें ? "


" चलो ठीक है,इसके माइण्ड हमारे कम्पयूटर के कांटेक्ट मेँ आ गया है.क्या था विचारा,दुष्ट इन्सानों ने इसे क्या बना डाला?इसका ही बेटा नहीं क्या इसके शक्ल का अफ्रीका के जंगलों मेँ?"


"नहीं!"

"इसके जुड़वा भाई की करतूत है वह..."

इधर अफ्रीका के जंगलों मेँ.....

Friday, 20 May 2011

बुद्धपुर्णिमा : बुद्ध अनीश्वरवाद!



हमारे विद्यालय अध्यापक परिवार में से एक हैं-ब्रह्माधार मिश्रा. जिनके रिश्ते में एक वृद्ध मामा जी हैं,जो कि कभी कभार विद्यालय में आते रहते हैं .जब मेरा उनसे आमना सामना होता है तो फिर धार्मिक व आध्यात्मिक चर्चा होती है.जब परसों उनसे मुलाकात हुई तो वे बोले कि अध्यात्म में क्या चल रहा है?



"क्या चल रहा है? बस,मेडिटेशन."



"आपने यह सब कहां से पाया ?आपने किसी को अपना आराध्य या गुरु तो मनाया ही होगा?"



"ऐसा नहीं है.दर असल बचपन से ही मेरा बुजुर्गों के बीच बैठना ज्यादा हुआ."



"कोई आराध्य नहीं है तो फिर साधना कैसे होती है?कोई राम राम जपता है कोई....."



"मैं कुछ मेडिटेशन क्रियाएं करता हूँ.एक-जैसे गौतम बुद्ध करते थे कि बैठ गये आंख करके और श्वास प्रक्रिया पर ध्यान देने लगे.इस तरह अन्य में........."



"बुद्ध को तो लोग अनिश्वरवादी मानते हैँ."



"लेकिन मैं नहीं.दुनियां में जिन ईश्वरों की बात की गयी है वे सब इस संसार में व इस संसार के लिए ही हैं.इससे आगे भी कुछ है.....अन्धकार .....शून्य फिर,यहां भी एक ब्लैक होल है जिसमें सारी दुनिया समा जाती.जिसके पार भी कुछ है.इस अन्धकार इस शून्य व इसके पार की अनुभूति को अभी तक कोई शब्द नहीं दे पाया है.बुद्ध ने इसकी कोशिस की है."



खाली की बहस बाजी क्यों?जो दुनिया से चिपके हैं,माया मोह लोभ अहंकार आदि से निकलने का प्रयत्न भी नहीं करना चाहते.सांसारिक सुख चाहते है,उन से ईश्वर की बात?



बुद्ध को अनिश्वरवादी मानने वाले जरा अपना आत्मसाक्षात्कार करें.



बुद्ध का जीवन से ही बुद्ध व उनके प्रिय शिष्य आनन्द के कुछ सम्वाद से स्पष्ट होता है कि बुद्ध ने उस समाज में ईश्वर की चर्चा करना व्यर्थ समझा ,जहां लोगों के मन ईश्वर में नहीं रमें हैं वरन माया मोह लोभ भोग विलास में रमें है या फिर वे ईश्वर की शरण में जाते भी हैं तो ईश में रमने के लिए नहीं वरन सांसारिक सुख पाने के लिए.ऐसे समाज के प्रति सन्त कबीर तक को भी कहना पड़ा था -मैं दुनिया के लिए जो देने आया हूँ,वह कोई लेने नहीं आता.



भक्त संसारिक सुख की कामना रखता है क्या ? ईश् भक्ति सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए ?बुद्ध ने ईश्वर नहीं ईश्वरता की बात की. उनके दर्शन में ईश्वर जरुर नहीं है लेकिन ईश्वरता है.योग के आठ अंग हैँ,जिसके बिना साधारण जन ईश्वरता धार्मिकता व आत्म साक्षात्कार की ओर यात्रा तय नहीं कर सकता.संसार के देवी देवता व भगवानों के पार शून्य में क्या है?योगियों ने शरीर system को आठ भाग में बांटा है-reproductory,excretory,digestive, skeletal,circulatory,respiratory,nervous and endocrinal system .सहस्रार चक्र अर्थात लतीफा-ए-उम्मुद दिमाग के बाद शून्य की दशा आती हैं .संसार के देवी देवता व भगवान इससे पूर्व के syastem में हैं.ऐसे में बुद्ध की शून्य स्थिति में सांसारिक देवी देवताओं व भगवानों की बात कैसे?लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बुद्ध को अनिश्वरवादी मान लिया जाए?

नारी शक्ति : मातृ शक्ति



सखि सम्प्रदाय में स्वयं को कृष्ण का सखि माना जाता हैं.कृष्ण क्या है? कृष्ण है वह शक्ति जिससे जगत व जगत के वे तत्व आकर्षित हैं जो कृष्ण के आकर्षण में बंधने के कारण ही सजीव कहलाते हैं व जिस के कारण ब्राह्मण्ड में सृजन या विध्वंस जारी रहता है.इस धरती पर मथुरा में जन्मा कृष्ण तो सिर्फ उस अनन्त शक्ति के अंश का सगुण के माध्यम से अपनी लीला का कारण है.वह अनन्त शक्ति ही हमसे लीला कराती है,जिसके हम एक कतरा हैं.हमारा दोष इतना है कि हम माया ,मोह ,लोभ, काम ,आदि में उस अनन्त शक्ति की लय रुपी बांसुरी के राग यानि कि लयता में लीन नहीं हो पाते.जोकि हमारे रोम रोम में भी बसी है.उस अनन्त शक्ति के अलावा चाहें वह हमारे अन्दर हो या अन्यत्र , सब प्रकृति है.प्रकृति स्त्री गुण है . वह साक्षात दुर्गा है.हमारा शरीर भी प्रकृति है . पुरुष की तरह स्त्री भी ' स्व ' से अन्जान है . ' स्व ' है ' आत्मा ' वह है ' परमात्मा ' , जो कि शिव है.स्त्री का शरीर हो या पुरुष का शरीर;प्रकृति है.दोनों तरह के शरीर में जो आत्मा है, वह अलैंगिक है.वही से अनन्त भगवान तक पहुंचा जा सकता है. सिर्फ स्त्री के स्थूल शरीर से आकर्षण का कारण 'काम' है.'काम' के अभाव में स्त्री के स्थूल शरीर से आकर्षण का कोई सांसारिक कारण नहीं रह जाता.ऐसे में फिर पत्नी को छोड़ बेटी ,मां ,बहिन ,चाची,बुआ,आदि की तरह हो जाती है स्त्री . ऐसे में पत्नी भी काम के अभाव में एक देवी के समान हो जाती है.कुछ ने तो पत्नी को भी वानप्रस्थ व सन्यास आश्रम में आकर मां का दर्जा दिया है .कामुक नर नारी ही नारी शक्ति को मातृशक्ति नहीं मान सकती.

What is India? : SALIL GEWALI



सलिल गेवाली द्वारा संकलित एवं प्रकाशित एक पुस्तक 'वाट इज इंडिया' सामने आयी है.जो कि औपनिवेशिक शासन के लूटपाट और विध्वंस और भारतीय श्रेष्ठता को नजरअंदाज किये जाने की सुविचारित साजिश के विरुद्ध युवा भारतीय मानस की एक सशक्त प्रतिक्रिया है.



खुसरो मेल, बरेली 8 मई 2011 समाचार पत्र के पृष्ठ आठ पर हिमांशु जोशी'भारत एक नई खोज'लेख में लिखते हैं-



"पश्चिमी देशों द्वारा अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए भारत को लगातार विरोधाभास से परिपूर्ण सपेरों और रहस्यों से परिपूर्ण देश के रुप में प्रचारित किया जाता रहा है.इस दुराग्रह के चलते प्राचीन भारतीय तर्कशास्त्रियों और वैज्ञानिकों द्वारा विकसित सिद्धांतों के साक्ष्य सामान्यत: वैज्ञानिक साहित्य की श्रेणी में नहीं स्वीकार किये जाते जबकि गणित,तर्कशास्त्र,दर्शन और औषधि विज्ञान के भारतीय ग्रन्थों में वास्तविक संसार और आत्मा परमात्मा के मूल्यों का विषद तुलनात्मक विवेचन किया गया है.दुष्प्रचार की इस तपिश को विश्व में अपनी प्रतिभा का डंका बजाने वाले युवा अप्रवासी भारतीय ने अपेक्षाकृत ज्यादा शिद्दत से महसूस किया और शायद इसी तथ्य के मद्देनजर अमरीका में रह रही फेसबुक की एक मित्र प्रियंका शर्मा के सौजन्य से सलिल गेवाली द्वारा संकलित एवं प्रकाशित पुस्तक ' वाट इज इंडिया ' से रुबरु होने का अवसर मिला .यह पुस्तक अल्बर्ट आइंसटाइन ,मार्क ट्वेन,एनी बेसेन्ट और राल्फ एमरसन समेत दुनिया भर के अनेक मूर्धन्य मनीशियों के भारतीय प्रतिभा के प्रति अनुभवों को साक्ष्य बनाकर पश्चिमी देशों द्वारा सदियों से किये जा रहे दुर्भावना पूर्ण कुप्रचार को बिना बोले ही अकाट्य रुप से शोथरा साबित करने के साथ सहज ही भारतीयता पर गर्व का अहसास कराने वाली शीतल बहार की मानिंद है. .... पश्चिमी देशों के सुनियोजित दुष्प्रचार के बावजूद भारत ने एक रहस्यमयी सुंदरी की तरह हमेशा दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया.
"


पश्चिमी देशों मेँ भारतीय साख बढ़ाने में अप्रवासी भारतीयों का योगदान अग्रणी रहेगा.यहां हमें ओशो का कथन स्मरण हो आया कि भविष्य में भारतीय विचार धारा प्रवाहित होगी,लेकिन भारत से नहीं विदेश से.

देहदान से क्या हर्ज ?



दान का मानव जीवन मेँ बड़ा महत्व रहा है.दान अनेक तरह के हैं,उनमें से एक दान है-देहदान. देहदान के प्रति मुझमें जिज्ञासा रही है कि देहदान कौन कर सकता है?क्या अस्वस्थ व्यक्ति भी अपना शरीर दान कर सकता है?शरीरदान के लिए जिले में कहां सम्पर्क किया जाए?आदि आदि.बरेली मण्डल के एक जनपद बदायूं सात व्यक्ति अपना शरीरदान कर चुके हैं.जिसके परिचय ,जीवनी आदि से सम्बन्धित पुस्तक बदायूं के दानदाता एक सजग सिंहावलोकन जून मास में प्रकाशित की जाएगी.ऐसा एक समाचार पत्र से हमें संज्ञान हुआ.

विवाह संस्था के दंश !



आज के भौतिक भोगवाद में शादी तय होने व करने का परम्परागत तरीका इंन्सान या रुहानी मूल्यों के खिलाफ अपना मंच खड़ा करता जा रहा है.भौतिक चमक धमक ,सामाजिक मर्यादा,प्रदर्शन,खानदानी इज्जत,आदि के सामने त्याग ,संयम,धैर्य,समर्पण,आदि का भाव खत्म हो रहा है.अच्छे इन्सान की पहचान उसके कपड़े,गाड़ी,बंगला,सम्पत्ति,आमदनी,आदि के आधार पर होता है.इसके ही साथ साथ हम अपना एक काल्पनिक जगत भी रखते है.जिसके आधार पर हम रिश्ता तय करते वक्त सामने वाले का आंकलन नहीँ करते.हम सामने वाले के शरीर,भौतिक स्तर ,बातचीत,पद,दहेज लेन देन,शादी के खर्च,आदि के आधार पर रिश्ता तय कर लेते हैं,लेकिन हम नहीं जानते कि हमारे अन्दर एक काल्पनिक व मानसिक जगत भी है;वह जरुरी नहीं कि सामने वाले से भविष्य में मेल खाये.इसी कारण भविष्य में तनाव की स्थिति पैदा होती है.हम से तो अच्छे वैदिक कालीन जंगली व आज के आदिबासी हैं.हम तो बाहर और अन्दर अलग अलग मूल्य छिपाए होते है.शादी तय करते वक्त हम जिन मूल्यों के आधार पर शादी तय करते हैं,शादी के बाद तलाक व टकराव के आधार के मूल्य अन्य हो जाते हैं.यह दोहरे मूल्य क्यों?शादी तय होने के वक्त ही उन मूल्यों को महत्व देना क्यो नहीं जिन मूल्यों के कारण तलाक व टकराव की स्थिति हो जाती है.अनेक व्यक्तियों के द्वारा एक ही व्यवहार व कर्म करने के पीछे भी सबका नजरिया अलग अलग हो सकता है.इस लिए कुछ विशेषज्ञोँ ने शादी से पूर्व युवक युवतियों के बीच काउंसलिंग आवश्यक वतायी है,जिसमें एक दूसरे के नजरिये व जीवन लक्ष्य को समझा जा सके.सामञ्जस्य की भी स्थितियां होती हैं.जिससे सामञ्जस्य नहीं होने की सम्भावनाएं छिपी हैं,लेकिन हम उसको लेकर उम्मीदों की दुनिया सजोये रिश्ता तय कर बैठते हैं तो क्या होगा ? अभी जल्द नई दिल्ली से एक समाचार मीडिया में आया कि दिल्ली महिला आयोग के अनुसार इस महानगर में हर साल करीब एक लाख तीस हजार शादियां होती हैं और दस हजार तलाक होते हैं.एक अनुमान के मुताबिक पिछले पांच सालों में तलाक लेने वालों की संख्या दोगुनी हो गयी है.शादी के प्रति अब लोगों का मन उचटने लगा है.जीवन के लिए महत्वपूर्ण है लक्ष्य समूह(वे लोग जो हमारे विचारधारा को आगे बढ़ाने वाले व सहयोग करने वाले हैं).वैदिक साहित्य में शादी का उद्देश्य धर्म माना गया है,जिससे कि हम माया ,मोह,लोभ,काम,क्रोध,आदि को प्रशिक्षित कर अपने मृत्यु के करीब शान्त मन में आ सकें लेकिन हम तो जीवन पर्यन्त माया ,मोह ,लोभ ,आदि में फंसे रहते हैं.शान्ति व सन्तुष्टि की लालसा रखते हुए भी शान्ति व सन्तुष्टि से दूर हो जाते हैं.ओशो ने कहा है कि जो संसार की वस्तुओं से सुख की कामना रखता है,वह मूर्ख है.एक मात्र दया,सेवा,अध्यात्म ,योग व आयुर्वेद /प्रकृति को स्वीकार करने से ही जीवन को सुखमय बना सकते हैं.

Monday, 2 May 2011

इंटरनेट के अभिव्यक्ति पर नियन्त्रण का विरोध!



हम सब इंटरनेट पर किसी न किसी तरह से वैचारिक क्रान्ति में लगे हुए हैँ.आओ हम सब इंटनेट पर नियन्त्रणों पर एक बहस छेंड़े,जो कि हम लोगो के लिए अति आवश्यक है.


बालेन्दु शर्मा दधीचि का कहना है-
"इंटरनेट पर विचारों और सूचनाओं के मुक्त आदान प्रदान से आम तौर पर चीन और ईरान जैसी सरकारों को समस्या रही है जो वेबसाइटों,ब्लागों,सर्च इंजनों और सोशियल नेटवर्किंग साइटों तक पर अंकुश लगाने के नए नए उपाय करती रहती हैं लेकिन इधर भारत सरकार ने अपने सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत कुछ कड़े नियम जारी कर हलचल मचा दी है.इन नियमों में इस्तेमाल की गई शब्दावली कुछ ऐसी है कि जरुरत पड़ने पर कोई भी सरकार आनलाइन माध्यमों के विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उनकी अलग अलग ढंग से व्याख्या कर सकती है. सरकार द्वारा तय किए गए मानदंड इतने व्यापक और शब्दावली इतनी ढीली ढाली है कि उसके दायरे मे तो ज्यादातर आनलाइन सामग्री आ जा एगी .ऐसी सामग्री के लिए भी इंटरनेट मध्यमोँ को दंडित किया जा सकता है जो किसी अन्य देश के लिए अपमानबनक हो.ऐसे प्रावधानों को पूरी तरह स्पष्ट बनाए बिना लागू करना उनके दुरुपयोग का पिटारा खोल सकता है.इंटरनेट कंपनियां और इंटरनेट उपभोक्ता इनसे खासे विचलित हैँ.आपको याद होगा छह साल पहले बाजी डाट काम (अब ईबे.को.इन)के सीईओ अवनीश बजाब को सिर्फ इस बात के लिए जेल जाना पड़ा था कि किसी यूजर ने उनकी वेबसाइट पर बिक्री के लिए अश्लील सीडी डाल दी थी.नए आईटी नियमों के तहत इस्तेमाल किए गए मानहानिकारक,अश्लील,घृणास्पद,संकीर्णपूर्ण,परेशान करने वाला ओर विदेश के लिए अपमानजनक जैसे मापदंडोँ का क्या मतलब है? घृणास्पद कितना, किस मायने में ,किसके लिए,किस किस्म की,आदि ढेरों पहलू हैं जिन्हें पूरी तरह साफ किए जाने की जरुरत है.अगर भ्रष्टाचार के विरुद्ध चल रही मुहिम के समर्थन में किसी वेबसाइट पर कोई आक्रामक लेख लिखा जाता है तो वह इनमें से अनेक श्रेणियों के तहत दंड का पात्र हो जाएगा.विकीलीक्स के सारे रहस्योद्घाटन इस कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आएंगे.अगर कोई ब्लागर आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान के समर्थन से व्यथित होकर या फिर सद्दाम हुसैन के विरूद्ध अमेरीकी कार्रवाई से व्यथित हो कर कोई आक्रामक लेख लिखता है तो उसे आप किस श्रेणी में मानेंगे?जाहिर है,इसकी व्याख्या आसानी से नकारात्मक रुप मे की जा सकती है.इसी तरह,अश्लीलता के क्या मायने है?हो सकता है किसी एक संस्कृति मे रहने वाले व्यक्ति के लिए जो अश्लील हो वह दूसरों के लिए न हो.बात फिर इंटरप्रिटेशन पर आ टिकती है. "



ओशो ने सुकरात के ही देश में कहा था-सुकरात को सत्ता ने मारा था,पब्लिक ने नहीं.आखिर ब्यूरेक्रेसी कब तक अभिव्यक्ति के खिलाफ बनी रहेगी?


जागो!इस पर बहस छेंड़ो.


आप सब सुने,यह आईटी नियम हम सब के खिलाफ है. वैचारिक क्रान्ति के खिलाफ है.

फिर कहता हूँ कि जागो!

हम लोगो को भी एक मंच बनाना होगा और इण्टरनेट से बाहर निकल कर धरती पर वर्ष मे एक बार एक सेमीनार व पुरस्कारों का सिलसिला प्रारम्भ करना होगा.

Sunday, 1 May 2011

गर जड़ें जिंदा बचीं : संगीता सक्सेना



ओशो ने कहा है कि अधिकतर मनुष्य उखड़े हुए पौधे की भांति हो चुका है,जिसे भौतिक संसाधनों के माध्यम से बचाने की कोशिस की जा रही है.अपनी जड़ जमीन से अलग हुआ पौधा कितना अपने शाश्वत जीवन की सहजता में जी सकता है? समाजवादी चिन्तक लोहिया ने मरते वक्त कहा था कि लगता है समाज अपनी आत्मा खो चुका है.देखा जाए तो व्यक्ति वास्तव में अपने धर्म व आत्मा से दूर जा चुका है.व्यक्ति जिसे धर्म मान रहा है ,वह धर्म है ही नहीं.


खैर....!



' गर जड़ें जिंदा बचीं ' !



बीसलपुर(पीलीभीत) उप्र की निवासी हैँ डा संगीता सक्सेना ,जो काव्य प्रतिभा की धनी हैं.' गर जड़ें जिंदा बचीं ' उनके द्वारा रचित एक श्रेष्ठ पुस्तक है .



जयपुर मेँ 'अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान' के तत्वावधान में गुरु अर्जुन देव जयंती का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमे बीसलपुर(पीलीभीत)उप्र की डा संगीता सक्सेना की पुस्तक'गर जड़ें जिंदा बचीं ' का विमोचन व समीक्षा प्रस्तुत की गई.समारोह के मुख्य अतिथि गुरुचरण सिँह गिल राष्ट्रीय अध्यक्ष सिक्ख संगत रहे.



बीसलपुर (पीलीभीत)उप्र की प्रबुद्ध जनता को नाज है.साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी के बाद अब डा संगीता सक्सेना ने बीसलपुर(पीलीभीत)उप्र का नाम दुनिया के प्रबुद्ध वर्ग के बीच ससम्मान पहुंचाया है.इस विषय पर बीसलपुर(पीलीभीत ) उप्र के ही युवा विचारक विमल वर्मा ने बताया कि डा संगीता सक्सेना से बीसलपुर (पीलीभीत)उप्र के प्रबुद्ध वर्ग की नाक ऊंची हुई है.

जयपुर मे हुए कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रोफेसर आर सी शर्मा व संचालन भवानी निकेतन कालेज जयपुर के संस्कृत विभाग की अध्यक्ष डा वेला मलिक ने किया.इस कार्यक्रम में परिषद के प्रदेशाध्यक्ष डा मथुरेश नंदन कुलश्रेष्ठ भी उपस्थित थे.



(प्रस्तुति:सुजाता देवी शास्त्री)

Saturday, 30 April 2011

म्यांऊ म्यांऊ मुलायम माया हैं न!




                                   अरे कहने दो , लोग कांग्रेस को गाली दें तो देने दो.पब्लिक को अपना पेट पालने से भी फुर्सत कहाँ? सत्ता भोग का आनन्द उठाओ.अरे यह अन्ना या रामदेव क्या कर लेंगे?चीखने दो इन्हें,दो प्रतिशत भी तो नहीं है इनके साथ . मतपेटियों का जिन्न हमारे साथ रहे ,बस.मस्लिम वोट ऐसे बड़ा काम का है.भ्रष्टाचार व कालेधन पर कोई मस्लिम थोड़े चीख रहे है. देश मे म म म की तिगड़ी के साथ यह चौथा म मुसलमान हमसे निकल कर बाहर नहीं जा सकता . विश्व स्तर पर भावी तिगड़ी भारत रूस चीन मुस्लिम आबादी के साथ मिल कर तीनो म का विश्व मे डंका बजा सकती है.अमेरीका को साथ लेना तो अभी कुछ वर्षों की आवश्यकता है.भविष्यवाणी को सत्य साबित किया जा सकता है कि भारत का म वर्ण नाम का नेता अपनी विश्व मे तूती बजाएगा .बात है नीली पगड़ी की नीली पगड़ी पहनने लगूंगा. चारो म (मनमोहन मुलायम माया मुस्लिम) मिल कर भारत ही नहीं सार्क देशों को प्रभावित कर सकते हैं,सम्भव हो सके तो पांचवा म माओ को भी साथ ले ले,सम्भव हो सके तो छठे म मुशरर्फ को भी साथ ले लें.अखण्ड भारत का लोहिया सपना साकार कर सकते है.प्लीज मुलायम सिंह!बड़ा अच्छा मौका है.कुछ कट्टर मुस्लिमों व कुछ पाकिस्तानियों का तालिबान व चीन के साथ मिल कर एक सपना सजोया है मुगलस्तान का ,यानि कि पाक कश्मीर हिमाचल उप्र बिहार प बंगाल बांग्ला देश मिलाकर ग्रेटपाकिस्तान का सपना.इस म के गुट को सबसे अच्छा हथियार है ऐसे में अखण्ड भारत का.मुस्लिमों को ला सड़क पर ला कर अखण्ड भारत के लिए आन्दोलन छोड़ दो.माओवादी बरेली तक अपना दावा करते हैं ,उनसे कहो बरेली तक ही क्या,पूरा भारत तुम्हारा है.अखण्ड भारत की मुहिम मे नेपाल व बांगला देश की जनता को भी जोड़ो.



                        मै भी हूँ कि फोकट में सलाह देने चला इन्हें.सोनिया जी राहुल जी आप भी सुनिए.क्या भविष्य मे भारत रत्न न पाने का? मरना तो है ही ,कुछ ऐस मुहिम छोड़ जाओ कि किसी की गोली या बम से मरना हो जाए.


                          शायद जांच रिपोर्ट मेँ राजीव गांधी के हत्या के षडयन्त्र के शक की सूई प्रधानमंत्री आवास की ओर ही थी ? सोनिया गांधी भी क्या अपने मूलदेश से यहां अकेली थोड़ी हैं?पूरी टीम काम रही है शायद?मै अपने आस पड़ोस मे भी कांग्रेसी देखता हूँ ,बड़े ईमानदार नजर आते है वे ? कुछ नेता तो देश मे ऐसे है ,अंग्रेजी काल मे उनके घर के ऊपर अंग्रेजी झण्डा लहराता था या उसकी छाया तले हां हजूरी करते थे.धन्य,भारत की जनता भी,उनको जिताना नहीं छोड़ती?सुनो माया व मुलायम,तुम दोनो कभी एक मंच पर थे.क्या तुम्हे पता है किसने कूटनीति फेंकी थी तुम दोनो की एकता पर?नहीं न.कितनी जनता ईमानदारी का खाना चाहती है?अट्ठानवे प्रतिशत से ऊपर जनता बेईमान व्यवस्था के चलते अपना जीवन चला रही है.ईमानदारी के रास्ते पर बड़े त्याग संयम व धैर्य की जरुरत होती है .अरे चलने दो,घोटाले पे घोटाले!यह सब तो राज काज मे चलता है.खुद भी खाओ औरों को भी खबाओ,जनता भी क्या चाहती है?जनता भी वहीं पर ईमानदारी के साथ खड़ी होती है,जहां उसका स्वार्थ नही.चीखने दो भ्रष्टाचार व कालेधन पर,कुछ हिन्दू वोट ही तो उनके साथ है.मुस्लिम उनमें जायेगा नही.


(यह मात्र एक व्यंग्य है.)

Thursday, 21 April 2011

भविष्य कथांश : www.akvashokbindu.blogspot.com

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From: akvashokbindu@yahoo.in
To: akvashokbindu@yahoo.in
Sent: Thu, 21 Apr 2011 13:29 IST
Subject: भविष्य कथांश : www.akvashokbindu.blogspot.com

भविष्य कथांश नाम से < www.akvashokbindu.blogspot.com > यह ब्लाग मैने अपनी भविष्य सम्बन्धी कल्पनाओं को सजोने के लिए बनायी थी.मैने सेक्युलर फोर्स नाम का एक उपन्यास लिख रखा है,जिसमें मैने दिखाया है कि किस तरह कुछ युवक देश के कुप्रबन्धन से परेशान हैं? व्यवस्थाओं मे परिवर्तन के लिए वे सेक्युलर फोर्स का गठन करते हैं.जिसका उद्देश्य होता है देश में कानून व्यवस्था कायम करना.
देश के नेता अफसर व कट्टरपंथी जिसके विरोध मे आ जाते है.आखिर देश मे सैनिक कार्यवाही होती है.जब स्थिति ज्यादा बिगड़ती है तो अमेरीका की फौजे आ डटती हैँ.

21मई2011की शाम!

89वर्षीय सिविल इंजीनियर हैरोल्ड कैपिंग इन दिनों फेमिली रेडियो नेटवर्क (लंदन)पर एक अभियान चला रहे हैं जिसमे चेतावनी दी गई है कि 21मई2011 को शाम छ बजे दुनिया खत्म हो जाएगी.इस चेतावनी मे कहा गया कि दुनिया के दो प्रतिशत लोगों को ही स्वर्ग नसीब होगा. कितना सत्य....

21दिसम्बर2012को तबाही!


अमेरिकन माया कलेंडर के अनुसार 21दिसम्बर2012वह दिन होगा जब सूर्य व पृथ्वी एक दूसरे के सबसे करीब होंगे और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की वजह से इसका बेहद प्रतिकूल असर पड़ेगा.जिसकी वजह से नार्थ पोल व साउथ पोल अपनी जगह बदल लेंगे.क्या सच होगा....


तृतीय विश्व युद्ध एशिया से!

अगले विश्व युद्ध का रणक्षेत्र एशिया होगा.अमेरीका की फौजे भारत मे होगी.अमेरीकी राईफल भारत के कन्धे पर से चीन पर निशाना लगायेगी.मुस्लिम चीन के साथ होंगे,गृहयुद्ध के साथ अन्य समस्याएं भी साथ आयेगी.


जो अपनी आत्मा के करीब होंगे वही शान्ति पायेंगे.

कान भरने वालों की ही सुनते रहोगे क्या?

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From: akvashokbindu@yahoo.in
To: akvashokbindu@yahoo.in
Sent: Thu, 21 Apr 2011 08:28 IST
Subject: कान भरने वालों की ही सुनते रहोगे क्या?

हमारा नजरिया कितना गिर चुका है.तथ्यों का संश्लेशण किए बिना तीसरे व्यक्तियो की सुन सिर्फ व्यवहार कर बैठना मूर्खता है.अनेक परिवार व रिश्ते इसलिए टूटते देखे गये है कि आपस में एक दूसरे की न सुनकर निदानात्मक चर्चा न कर भड़क उठना व आपस में अपनी समस्या निपटाने की क्षमता का अभाव तीसरे व्यक्ति के चक्कर मे पड़ जाते है.हमे परिवार व समाज मे ऐसे व्यक्ति मिल जाते है जो कि अपनी धुन मे
जीकर आपस मे नुक्ताचीनी व एकदूसरे पर दोष मड़ते रहते है लेकिन समस्याओं का हल करने की योग्यता नहीं रखते .इसका मुख्य कारण इनके मन में नम्रता व विवेक का मिट जाना है.यह तटस्थ होकर पक्ष व विपक्ष दोनों पर चिन्तन नहीं कर पाते,या तो यह सामने वाले के पक्ष मे होते है या विपक्ष में लेकिन निष्पक्ष हो सत्य तक जाने का प्रयत्न नहीं करते. हाँ कान के कच्चे होने के कारण तीसरे की सुन आचरण अवश्य
कर सकते है,वास्तव में देखा जाए तो यह स्वार्थ या स्वार्थी तत्वों के चंगुल में फंस कर रह जाते हैं .यह दंश ही होते हैं न्यायवादी व मानवीय व्यवस्था मेँ .यह लोग दूसरे के जीवन मे हस्तक्षेप तो कर सकते हैं लेकिन सहयोग नहीं.समाज व देश की छोड़ो अब तो कुछ परिवारों मे यह देखने को मिल रहा है और परिजन ही कभी कभी दुश्मन नजर आने लगते है क्योकि वे कारणो व दूसरे को जानने की कोशिस न करके बस जीवन
को निराशा मे ढकेलना जानते है.बदले की भावना में इंसानियत का गला घोटते है.

Wednesday, 20 April 2011

उम्मीद ही है पहला कदम : प्रीतीश नंदी



----- Forwarded Message ----
From: Akvashokbindu <akvashokbindu@gmail.com>
To: akvashokbindu@yahoo.in
Sent: Fri, 15 April, 2011 8:53:40 AM
Subject: उम्मीद ही है पहला कदम : प्रीतीश नंदी

जिन लोगों ने 1947या1977की घटनाएं नहीं देखीं,उनके लिए यह एक जनांदोलन के साक्षी होने का पहला मौका था.देश के जिस युवा को एकजुट करने के लिए राहुल गांधी एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए थे,उन्हेँ अन्ना हजारे ने कुछ ही दिनों में एकजुट कर दिया.मैने इन युवाओं को हर जगह पाया.जंतर मंतर पर,आजाद मैदान में ,गेटवे आफ इण्डिया पर.हर शहरकी गली और कूचे में,हर टीवी चैनल पर अपने दिल की बात कहते हुए.हर उस भारतीय की तरह,जिसने इस जनान्दोलन में अपनी छोटी सी भूमिका का निर्वाह किया था,मैने भी गौरव व सशक्तता का अनुभव किया.देश को बदलने का हमारा विश्वास लौट आया था.हमने यह भी साबित कर दिया कि बुजुर्गों और नौजवानों के स्वपन भी एक हो सकते है.



.......और अब अन्ना हजारे ने एक बार फिर हमें यह सिखाया कि कुछ भी असम्भव नहीं है.सरकार चाहे कितनी ही ताकतवर क्यों न हो,उसे लोगों की आकाक्षाओं के सामने झुकना ही पड़ता है.हम प्रयास करें कि कोई भी सिनिकल व्यक्ति इस सच को झुठला न सके.

विश्व को शान्ति की झलक !



संतों की कमी नहीं धरती पर!



जो पापों से कभी मुक्त न हो सकते,हम उनको पापों से मुक्त करा देंगे.


जिन जिन मेँ गुरु भक्ति न आई,उन उन में गुरु भक्ति करा देंगे..



--परम संत बाबा जयगुरुदेव जी महाराज नाम से चर्चित सन्त तुलसी दास का यह कहना है.



02 मार्च 2009 ई0 को मैं मथुरा स्थित जयगुरुदेव आश्रम में था.एक पुस्तक 'जड़ से चेतन की ओर' एक पृष्ठ 'भविष्यवाणी'पर यह पंक्तियां लिखीं थीँ.


मेरे पास खड़ा
एक अधेड़ बोला -देखो यह लिखा है.जड़ से भगवान का भजन नहीं होता.जब आत्मा पर से कर्मों का पर्दा हटेगा खोल उतरेगा तब सुरत से सच्चा भजन होगा......इस मनुष्य मन्दिर में जहां सुरत बैठी हुई है वहीं हरि द्वार है यानि हरि के पास जाने का दरवाजा वहीं है.अच्छे बुरे कर्म करके आपने उसे दरवाजे को बंद कर दिया है आत्मकर्म करो तो दरवाजा खुल जाएगा....सत्संग तो वो है कि सत असत का निरूपण किया जाता है.



कुछ दूरी पर मंच के सामने लोग मेडिटेशन में थे.एक ओर जयगुरुदेव की लगी तश्वीर पर लिखा था कि विश्व को शान्ति अब इन्हीं से मिलेगी.

अमेरिका की
महिला भविष्यवेत्ता फ्लोरेंसे ने दी फेल आफ सैन्सेशनल कल्चर नामक पुस्तक में लिखा है कि सन 2000 ई0 आते आते प्राकृतिक संतुलन भयावह रूप से बिगड़ेगा.लोगों में आक्रोश की प्रबल भावना होगी.लोगों की अतृप्त अभिलाषाएं और जोर पकड़ेंगी व आपसी कटुता बढ़ेगी.ऐसे एक वैचारिक क्रान्ति दुनिया को प्रभावित करेगी.तीसरे विश्व युद्ध की शंका के दौरान बागडोर आध्यात्मिक प्रवृत्तियां संभालेंगी.



ओशो ने कहा है कि विभिन्न समस्याओं की जड़ हमारा मन है.प्रकृति व संसार समस्या नहीं है वरन उसको सोचने का ढंग समस्या है.स्थूल घटनाओं में परिवर्तन से सबके मन नहीं बदल जाते.मन बदलेगा गुरु का सानिध्य.अपने के अन्दर का गुरु पहचानो.हर कोई के अन्दर एक महापुरुष है.बस उस पर पकड़ बनाना मुश्किल होता है.सिर्फ निज स्वार्थ के लिए जीने की परम्परा परिवार,समाज,देश व विश्व का कल्याण नहीं कर सकती.न ही उसे चरित्र से मानव कहा जा सकता जो सिर्फ अपने निज स्वार्थ के लिए जीवन जीता है.यह एक शोध का विषय है कि आपात स्थितियों में जो बचते हैं वे क्या अपने शारीरिक ऐन्द्रिक आभा से निकल कर स्व अर्थात आत्मा की आभा का एहसास पाते हैं?


अपने अन्दर के उस सन्त को पाने के बाद,सगुण नारी (प्रकृति) में अपने मन को रमाने के बजाय अपने अन्दर के निर्गुण नारी को पहचाने के बाद उसमें रमने के बाद अपने आत्मा पर आ ही महानता पर चलने का द्वार पा सकते है और विश्व शान्ति प्रति समर्पण की सहजता पा सकते है.



हमें कभी न कभी यह सत्य स्वीकार करना पड़ेगा ही कि हम सिर्फ हड्डी मास का पुतला नहीं हैं व हम इस धरती पर जब आते हैं तो अकेले नहीं आते हैं वरन हम एक नेटवर्क मेँ बंधे होते है.हमारी अशान्ति व असन्तुष्टि का कारण यही है कि हम अपने को नहीं पहचान पाते और अपने नेटवर्क से नहीं जुड़ पाते.
अनेक के साथ ऐसा होता है कि व्यक्ति आसान सुलभ व अवसर आधारित रास्ता चुन अपनी प्रतिभा,क्षमता,सामर्थ्य व शक्ति को दबा डालता है.जीवन मेँ त्याग,संयम,आदि से काम नहीं लेता.जोखिम उठाने का साहस नहीं रखता.इसका कारण अपने स्व से दूरियों का होना है.

< www.akvashokbindu.blogpot.com >

Saturday, 26 March 2011

हजरत दूल्हा मियां के उर्स( 23 - 26 मार्च2011ई0) पर चिन्तन !


Sent: Sat, 26 March, 2011 3:13:13 AM
Subject: हजरत दूल्हा मियां के उर्स( 23 - 26 मार्च2011ई0) पर चिन्तन !

धर्म व अध्यात्म प्राणियों के बीच द्वेष व मतभेद नहीं रखता.हम हिन्दू हो या मुसलमान या अन्य,सेवा व दया भाव का जिक्र सभी जगह पर मिलता है.मन्दिर, मस्जिद, आदि धर्मस्थल व सम्प्रदाय ,आदि तो सनातन यात्रा के विभिन्न स्तरोँ ,चक्र,लतीफ,system,आदि के आधार पर पड़ाव है,हमारे अन्तस्थ धर्म के.


जन्म के बाद
इस संसार मे अन्तस्थ यात्रा का पहला पड़ाव है-स्थूल,मूलाधार चक्र अर्थात reproductory.हमे लगता है अधिकतर लोग इसी स्तर पर आकर रुक गये हैँ.शहद के बर्तन मेँ चिपकी मधुमक्खी की तरह हो गये हैं,जो चिपक मे ही आनन्दित हो भूत व नरकीय योनि की सम्भावनाओं मेँ जी रहे है.'लतीफा-ए-उम्मुद-दिमाग 'अर्थात सहस्राधार चक्र तक की यात्रा का ख्वाब तक नहीं रखते .इनमे से कुछ यल्ह अर्थात अल्हा का अपने भौतिक दुखों व भौतिक लालसाओं के कारण स्मरण संसार की निर्जीव वस्तुओं से निर्मित चित्रों, मूर्तियों, मजारों ,मजहब- स्थलों ,आदि में उलझ कर रह जाते है. वे यह नहीं जानते कि आत्मसाक्षात्कार के बिना हम यल्ह तक नहीं पहुंच सकते.




इससे हट कर अपने ईमान पर पक्का होना क्या गलत है?मुसलमान का अर्थ क्या है ?अपने ईमान पर पक्का होना न ! क्षेत्रीयता(हिन्दू शब्द की शाब्दिक परिभाषा में जायें) ,जाति,छुआ छूत,मजहब स्थलों,सम्प्रदाय,मूर्तियां,आदि से ऊपर उठ कर इन्सानियत,दया,सेवा,आत्म साक्षात्कार,अपने पराये भाव से मुक्ति,नमाज (सूर्य नमस्कार) ,दान,हज,आदि के माध्यम से यल्ह अर्थात ईश्वर तक पहुंच सकते हैं.



सऊदी अरब की मक्का मस्जिद के इमाम ए हरम शेख अब्दुर रहमान बिन अब्दुल अजीज अल सुदेस ने कहा कि दुनिया को इस वक्त अमन की सर्वाधिक दरकार है.इसी रास्ते पर चल कर इंसानियत महफूज रह सकती है.अमन की पहल मुसलमान करें.



वास्तव में जो अपने ईमान पर पक्का है ,वही दुनिया में अमन चैन व बसुधैव कुटुम्बकम की बात कर सकता है.तमाम मुल्कों के शरहदों को नकारते हुए दुनिया के इन्सान की हिफाजत की बात वही सोंच सकता है जो अपने ईमान पर पक्का है.हमे इस पर चिन्तन करना चाहिए कि तमाम मुल्कों की शरहदें आम आदमी के लिए खोल देनी चाहिए.शरहदें सिर्फ प्रशासनिक हों.



सच्चे मुसलमान थे मोहम्मद साहब लेकिन उनके गुजर जाने बाद सनातन यात्रा मेँ रुकावट आ गयी .इसके बाद मुस्लिम सम्प्राय तो बढ़ा लेकिन सनातन धर्म के यात्रा में रुकावट आ गयी.समूर्ण इंसानिय त के स्थान गुट,मस्जिद ,मजारों,आदि पर इनके अनुयायी भी आ टिके.अन्तर्यात्रा में रुकावट आ गयी.




दुनिया मे हमे एक ऐसा मंच चाहिए जहाँ गैरमुसलमानों का भी अपना दर्जा हो.हम आगे बढ़ गये है,अगले पड़ावों की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम निचले पड़ाव पर खड़े व्यक्तियों को वक्त न देँ. जो अ, आ ,इ ,ई,......ध्वनियां सीखने के लिए अमरुद,आम,इमली,ईख,.......आदि में उलझे हैं ,उनका हम विरोध भी नहीं कर सकते.




बरेली,उप्र में प्रस्तावित श्री अर्द्धनारीश्वर शक्तिपीठ के संस्थापक श्री राजेन्द्र प्रताप सिंह (भैया जी) से 20 दिसम्बर 2010ई0 को मुलाकात हुई,सब कुछ ठीक था.ईमान पर पक्के होने की बात उनमें थी ,वहां ओम तत् सत् की बात थी.लेकिन हम चित्रों ,मूर्तियोँ ,धर्म स्थलों ,आदि मेँ क्यों उलझें ?लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि बच्चों को काफिर कह उनसे द्वेष रखें.हाँ,वे अभी बच्चे ही हैं जो कि चित्रों ,मूर्तियों, मजारोँ ,धर्म स्थलों ,आदि में उलझे हैं,उनसे मुख मोड़ लें. उन्हें भी प्रेम व स्नेह दो .इसका फायदा भविष्य में हो सकता हैँ.चलो ,यह तो है कि वे ईश्वर को याद तो कर रहे है.शायद भविष्य मेँ वे शेष अगली यात्रा तय कर सकें?



इन दिनों यहां मीरानपुर कटरा में महान प्रसिद्ध सूफी संत हजरत सैय्यद दूल्हा मियां कलीमी व हजरत सैय्यद मसरुर मियां कलीमी का 23मार्च से सालाना उर्स चल रहा है.जहां बंगाल ,बिहार ,कलकत्ता ,मुम्बई ,दिल्ली सहित तमाम प्रान्तों से हजारों की संख्या में जायरीनों का आना चालू है.जिसके इन्तजाम में कुछ गैरमुस्लिम भी लगे हैं.सम्पूर्ण व्यवस्था प्रमुख रूप से दरगाह मुतावल्ली हजरत सैय्यद मसूद अहमद कलीमी देख रहे हैं.बंगाल के कुछ जायरीन से मैने मुलाकात की ,उन्होने माना कि दुनिया के तमाम मजहब तो रास्ता हैं जो इंसान को सनातन धर्म की यात्रा पर डालते हैं.दोष तो इंसान में होते हैं कि वे आत्मसाक्षात्कार को न पकड़ संसार की निर्जीव वस्तुओं के सहारे आगे की यात्रा न तय कर निर्जीव वस्तुओं या संसार में उलझ कर रह जाते हैं और आगे की यात्रा तय न कर खुदा से सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते.



ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



miranpur katra,

shahjahanpur,U.P.

भारत स्वाभिमान यात्रा / ट्रस्ट !



भारत स्वाभिमान यात्रा / ट्रस्ट !



यहाँ पर तीन शब्द - भारत,स्वाभिमान यात्रा /ट्रस्ट.



भारत !


भारत यानि कि भा रत,प्रकाश मे रत.
ज्ञान मे जो रत है, वह भारत है.सृष्टि के वाद प्रकृति अनुशीलन व प्रकृति से भय ने मनुष्य मे भक्ति पैदा की .भक्ति के दो मार्ग पैदा हुए -सगुण व निर्गुण.प्रकृति पांच तत्वों से निर्मित होती है-अग्नि,आकाश, जल,वायु और पृथ्वी.इन्हीं पांचो तत्वों को आदि भक्तों ने सम्मानित किया.जो ज्ञान उत्पन्न हुआ,सिन्धु के इस पार नाम दिया गया-वेद.जिसे ऋग्वेद मे संकलित किया गया,सिन्धु के उस पार अवेस्ता मे .सनातन ज्ञान ने सत का आभास दिया . जिससे सत तक की यात्रा व अन्तर्यात्रा का मार्ग प्राप्त हुआ.मानव को महामानव बनाने व वेदान्त तक की यात्रा का प्रबन्धन-ऋग्वैदिक संस्कृति के माध्यम से.ओशो ने कहा है ,'भारत सनातन यात्रा का नाम है' .भा रत अर्थात ज्ञान मे लीन सदा गतिशील रह कर यात्रा करते रह ही सत तक पहुंच सकता है.तरंगों,ऊर्जा ,प्रकाश , ऊष्मा,आदि का स्वभाव होता है -गतिशीलता. चक्र अर्थात SYSTEM अर्थात लतीफ,सूफी सन्तों ने चक्र को लतीफ कहा है- मूलाधार,स्वाधिष्ठान,मणिपूर, हृदय ,अनाहत, आज्ञा,सहस्रार .यह चक्र व इन चक्रों से ऊपर उठना भी एक यात्रा है.एक सूफी सन्त कहता है कि मेरा धर्म है-अन्तर्यात्रा.



स्वाभिमान !

स्वाभिमान शब्द दो शब्दों से बना है-स्व व अभिमान. ' स्व ' क्या है? 'स्व' है -आत्मा या परमात्मा.
स्व तक हम नैतिकता व कानूनों के माध्यम से पहुँच सकते हैं .कानूनों में यदि कमियां हैं तो उनमे सुधार किया जाता है.



यात्रा!
गतिशीलता शाश्वत नियम है.मानव की दो यात्राएं है-स्थूल यात्रा व अन्तर्यात्रा.




अपना ट्रस्ट यानि कि अपना लक्ष्य !


दुनिया मे अपना सर्वश्रेष्ठ परिवार वह होता है ,जो कि अपना लक्ष्य समूह होता है.लक्ष्य समूह क्या है?वह समूह जिसके सदस्यों का एक विशेष लक्ष्य समान होता है .




शेष फिर-



ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'



A.B.V.INTER COLLEGE,


meeranpur katra,

shahjahanpur. U.P.