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Tuesday, 25 February 2020

भूत से वर्तमान की ओर!!स्थूल से सूक्ष्म की ओर.......

  हम यदि आंख बंद कर बैठे हैं,और आप चुपके से आकर हमारे पास बैठ जाएं और हमें अहसास न हो तो आप  हम ईश्वर को महसूस करने की ओर कैसे बढ़ेंगे? हम आप तो अभी अपने को ही महसूस नहीं करते हैं। हमने कहीं पर पढ़ा था कि 80 प्रतिशत से ऊपर व्यक्ति भूत योनि/नरक योनि की संभावनाओं में जीता है। हम आपके घर पर आते है, आप हमें आदर से बैठालते है,नाश्ता कराते है, सम्मान से बात करते हैं....आदि आदि। वहीं जब हम ये शरीर त्यागने के बाद  आप के पास आते हैं तो आप डरते है..... ये बात हमें समझ में न आती है। देखा गया है जब कोई मुर्दा में वापस जान आ जाती है तो कुछ लोग डर कर भागते हैं। ये सब क्या है??आप हम अभी जीवन की सम्पूर्णता(आल/अल/all/योग))/आदि) से जुड़े नहीं है।आप चाहें कितने भी अपनी जाति/मजहब पर गर्व करें?अभी आप धर्म/अध्यात्म/वर्तमान/जीवन/आदि में नहीं हैं।आप ईश्वर को महसूस करने की ओर नहीं हैं। हम मालिक के कृपा पात्र हैं,हमें किशोरावस्था से ही इसका अहसास होने लगा।शिक्षा की शरुआत सन्तों के बीच से शुरू हुई, मंदिरों में जाना शुरू किया तो शिक्षा के लिए न कि परम्पराओं को ढोने के लिए।ब्रह्मनाद ने हमें आंख बंद कर बैठने की परंपरा से सिर्फ जोड़ा न कि जातीय/मजहबी रीति रिवाजों, कांडों में। आंख बंद कर हमने कुछ महसूस करना शुरू किया जो हमारे शरीर व मन को आराम देता रहा।,अपने करीब किसी का होने का अहसास करता रहा।यहीं से हम बसुधैव कुटुम्बकम, विश्व बंधुत्व, सागर में कुंभ कुंभ में सागर, अनेकता में एकता...... आदि को महसूस करना शुरू किया।और स्वत:वेदांग के आखिरी अंग ज्योतिष को भी महसूस करना शुरू किया।



          हम सब अभी अपनी निजता/आत्मियता/आत्मा की यात्रा ही शुरू नहीं कर पा रहे हैं। हम अभी अपने अहसास से ही काफी दूर हैं।इससे आगे के पायदान पर कैसे पहुंचेगे? हम लगभग नौ बजे जो साधना करते हैं, वह हमें भेद से अभेद की ओर ले जाती है। हम ने शिक्षा की शुरुआत मन्दिर से की,कुछ वर्षों बाद एक मढ़ी में, जो बाला जी की मढ़ी के नाम से जानी जाती थी।जहाँ अनेक सन्त स्थूल व सूक्ष्म(समाधि) से रहते थे... हमने सूक्ष्म यात्रा को अपने स्थूल में रहते ही महसूस करना शुरू किया। हम अपने तीन रूप में पूर्णता पाते हैं/स्थूल, सूक्ष्म व कारण। हम सब स्थूल जगत की बनाबटों,पूर्वाग्रहों ,छापों आदि में ही व्यस्त रहते हैं इससे आगे  की जीवन यात्रा के साक्षी नहीं हो पाते। मालिक की हम पर कृपा रही है।



           अनेक बार सुनने को मिला है कि जब इंसान की मृत्यु करीब आयी है तो उसे सूक्ष्म जगत की शक्तियां या लोग दिखाई देने लगे हैं।जिंदा उनके करीबियों को भी मरने वाले के सम्बंध में स्पष्ट अस्पष्ट सूक्ष्म जगत दिखाए देने लगता है। जो व्यक्ति हमें प्रिय नहीं होता या हमारी आदतों में नहीं होता वह भी के साथ हम रहना नहीं चाहते लेकिन धीरे धीरे उसके साथ रहने का वक्त आगे बढ़ता है वह हमारे जीवन का हिस्सा बन जाता है।ऐसे में हमारा वातावरण,व्यवस्था, उसमे रहने का समय,अभ्यास या परिस्थितियों को हमें उसके अति नजदीक ले आती हैं और हमारा सूक्ष्म जगत भी उससे प्रभावित हो जाता है।

   जन्म व मृत्यु के वक्त को मानव जीवन मे काफी महत्व दिया गया है। ये दोनों वक्त हमभी सूक्ष्म जगत से जुड़ने या सूक्ष्म कगत की सहानुभूति पा सकते हैं।सूक्ष्म जगत का स्तर इस वक्त करीब होता है।अतः ऐसा श्मशान व कब्रस्तान में भी देखा गया है। साधारण व्यक्ति भी इन स्थानों पर दार्शनिक व आध्यात्मिक हो जाता है।हम अपनी मृत्यु अर्थात अपने इस शरीर की मृत्यु से पूर्व भी सूक्ष्म जगत में प्रवेश कर सकते है।  इसलिए किसी ने कहा कि किसी व्यक्ति  लिए उसके स्थूल शरीर की मृत्यु के बाद कुछ भी किया तो क्या किया?उसके जिंदा रहते उसके सम्मान ,कल्याण,शांति,सन्तुष्टि के लिए क्या किया?व्यक्ति का सम्मान इसके जिंदा रहते होजाना चाहिए।

  हमारी व्यवस्थाएं, हमारी कृत्रिमताएँ कैसी होनी चाहिए?एक दिन हम हम जलालाबाद रोड पर फिलनगर की ओर से पैदल चले आ रहे थे।हमारे लिए कंकरीटईंट सर बने धर्मस्थल महत्वपूर्ण नहीं हैं।हम वहाँ वहां जाने किस प्रयत्न करते हैं-जहाँ हमें सूक्ष्म स्तर की शक्तियों का अहसास होता है। हां, हम फिलनगर की ओर से आ रहे थे।श्री बलवन्तसिंह  इंटर कालेज के सामने एक मोटरसाइकिल पर एक व्यक्ति अपनी पत्नी व अपने दो साल के बेटा के साथ बैठा था।जब हम आगे निकल गए और उसने हमसे नमस्ते की ।हम आगे निकल आये। कुछ दिनों बाद हमे पता चला कि वे वहां पर क्यों रुके थे?

   "गुरुजी को आगे निकल जाने दो फिर हम चलते हैं।"-इसका मतलब समझते हो।हम जब विद्यार्थी थे,स्कूल आते जाते वक्त व अन्य किसी वक्त हमारे2 कोई टीचर मिल जाते थे।तब हमारा विचार होता था कि इन्हें आगे निकल जाने दो। ये सब क्या है?हमें तय करना होगा, हम कुछ या किसी के पीछे तो चलें या साथ साथ चलें। वह मोटर साइकिल सबार जब भी अकेले मिल जाता तो हमें बैठा कर आगे हमारी मंजिल पर वह पहुंचा देता। जब फैमिली के साथ तो ऐसा। जैसा हमारा स्तर बैसा हमारा सोंच। दुनिया  की नजर में वह मुसलमान है लेकिन भेद क्यों? ये हमारी नाक, हाथपैर, सिर आंख.... इसका मांस न हिन्दू है न मुसलमान, इसकी कोई जाति नहीं कोई मजहब नहीं।हमारे पास दिल है हमारे पास दिमाग है,हमारी भावनाएं है,हमारे विचार हैं-उनकी न जाति न मजहब ।

  आत्मा सनातन है,हमारा धर्म आत्मा ही है।चलो, तुम्हारी बात मान लेते है। तुम भी धर्म,ईश्वर आदि की आड़ में कुछ तो कर रहे हो।लेकिन जो कर रहे हो ,जिस स्तर जिस बिंदु पर कर रहे हो-उससे आगे भी चेतना व अपने अस्तित्व के बिंदु व स्तर हैं।जीवन विकसित नहीं है, विकास शील है।।।निरन्तरता को स्वीकारो।।।अपने से जुडो।अपने को अनुभव करो।आओ, कुछ देर हमारे साथ आंख बंद कर बैठो।।

Saturday, 22 February 2020

सम्मान, स्वास्थ्य, शिक्षा, आध्यत्म, सुरक्षा, जीवन यापन ,भय मुक्त समाज आदि को वरीयता के बिना कोई राष्ट्र सक्षम नहीं!!

 राष्ट्र स्वयं क्या है?
जनता क्या खा रही है?इसपर जब राष्ट्र सजग नहीं?
जब हर कोई का देश में सम्मान नहीं!
जब शिक्षा प्रणाली दोहरी तेहरी, सभी को निशुल्क  बेहतर शिक्षा नहीं।
जब देश में 85 प्रतिशत अपना बेहतर इलाज न करवा सके।
जब भय मुक्त समाज नहीं।
जब जातिवाद मजहब वाद विहीन समाज नहीं।
जब कोई बाला सुरक्षित नहीं।
जब व्यक्ति के स्तर को उच्च करने का वातावरण नहीं।
जब देश की जनता आंतरिक दिव्य चेतना के विस्तार के अवसर के अभाव में!
आदि आदि।
तब 15 प्रतिशत की सत्तादारी, भागीदारी आदि से सिर्फ काम नहीं चलता लोकतंत्र जनतंत्र में!!

Friday, 21 February 2020

सभी समस्याओं की जड़ है - हमारी आस्थाएं व नजरिया!! अपने या आत्मा प्रति बेईमान होना!!

 दुनिया अभी जड़ तक नहीं पहुंच रही है। कानून पर कानून... बड़ा होता संविधान!!सोचो उन देशों की जहां संविधान के नाम पर सिर्फ आदेश हैं या कुछ लिखित पन्ने।किसी किसी देश में बहुत ही छोटा संविधान है। यदि हम ईमानदार हों व कानूनी व्यवस्था चाहते हों तो संविधान के रूप में दो चार पंक्तिया ही काफी हैं,जैसे-घर व समाज में शांति व्यवस्था बनी रहनी चाहिए, कोई किसी को कष्ट न दे।सत्य व न्याय स्वीकार हो।सब अपनी आवश्यकताओं के लिए किसी को व प्रकृति को कष्ट न दिए विकास कार्य कर सकते हैं....आदि आदि।
       हम कहते रहे हैं-सभी समस्याओं की जड़ है हमारा नजरिया व आस्था व उस पर ही टिक जाना।ये सोच व विकास शीलता ,परिवर्तन का स्वीकार आदि का अभाव।आगे के बिंदुओं, स्तरों पर नजर का अभाव।अपने मन, समझ, चेतना को अग्रिम बिंदुओं की ओर यात्रा का विराम!!!!!



 हम वास्तव में अपनी निजता, आत्मा, अपने अंदर की दिव्यता के प्रति ईमानदार नहीं रह गए हैं। लोग80-90 साल के है जाते हैं, पूजा पाठ, मन्त्र उच्चारण आदि के लिए भी इंद्रिया कार्य नहीं करती लेकिन किशोर अवस्था की सोंच, स्वप्न्न, इच्छाएं मन को डिस्टर्व करती रहती हैं।इसका कारण है,हमने सनातन विद्वानों की इस धारणा को तोड़ दिया 25 साल तक का जीवन ब्रह्मचर्य होता है।कोई मन्त्र बार बार जपते रहने से जरूरी नहीं कल्याण हो।।।
गौतम बुद्ध ने कहा है दुख का कारण इच्छाएं है। हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं,जो हमारी उन्नति में बाधक है..... !!!
रैदास जी ने कहा है-मन चंगा तो कठौती में गंगा...!!!मन चंगा कब होए???राम राम जपते रहो.... नजरिया ,विचार व आस्था आदि निम्न स्तर की बनाए रखो... हो गया काम??? न बाबा!!!

Saturday, 15 February 2020

चलो ठीक है इस बहाने कुछ तो अहसास है-शांति व मौन के सम्मान का!!अशोक कुमार वर्मा'बिंदु'

चलो ठीक है किसी बहाने शांति व मौन की ओर तो बढ़ रहे हो!!
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इसका मतलब है आप जानते हो,कुछ तो है जिसके लिए शांति व मौन भी चाहिए। वैसे आप भूलते ही जा रहे हो कि जीवन।में शांति व मौन भी चाहिए। आप भूल गए वह परम्परा, जब लोग मौन व्रत रहा करते थे। ये शन्ति व मौन ही हमें अपनी दिव्यता अपने ब्रह्म तत्व से जोड़ता है,इस लिए विद्यार्थी जीवन को ,25-28 वर्ष तक के जीवन को ब्रह्मचर्य जीवन कहा गया था। जो तैयारी था हमारे गृहस्थ जीवन का। 25-28 वर्ष तक या जीवन का शुरुआती चौथयाई भाग वह भाग है,जिसमें हम अपनी ऊर्जा या चेतना के उत्साहित, उमंगित, अन्नतित ऊर्जा,विकासशील  स्तर पर होते हैं।जिसको हम ब्रह्मचर्य या आचार्य होने के साथ ही जी सकते हैं।जिसके लिए एक प्रकार का गुरुत्वीय वातावरण चाहिए होता है।जिसके लिए हमारे आश्रम व गुरुद्वारा हुआ करते थे।इस लिए हम धर्म स्थल सिर्फ आश्रम व गुरुद्वारा को ही माना करते थे।जहां हम उस समूह में रहने, समूह व्यवस्था, तंत्रात्मक व्यवस्था का अनुशासन सीखते थे, नियमितता सीखते थे ,दिनचर्या सीखते थे जो प्रकृति, अपने हाड़ मास शरीर, अन्य हाड़ मास शरीरों, जीव जंतुओं, वनस्पतियों आदि के संग बिताते हैं। तब हम सीखते थे हम कैसे आगामी जीवन के पड़ाव ग्रहस्थजीवन या वानप्रस्थ जीवन को उस अहसास के साथ जिएं जो हमारा निजत्व है,आत्मा है,स्व है,सर्व व्याप्त चेतना व  सम्वेदना है।जैसे लहर व सागर का सम्बंध, किरण व सूरज का सम्बंध..... वैसे ही हमारा व आत्मा का,आत्मा व परम् आत्मा का सम्वन्ध...... अनन्त यात्रा का पथिक.... सनातन यात्रा का पथिक.....!!
आज हमें उस बेहतरी से गिरावट के कारण कैमरों की नजर में रह कर अनुशासन रहने की व्यबस्था को सीखना पड़ रहा है।हम भूल गए कि हर वक्त एक दृष्टि हम पर व जगत पर होती है। हम भूल गए अपना चरित्र उस दृष्टि में गढ़ना।।

Wednesday, 12 February 2020

मीरानपुर कटरा में निशांत दास पार्थ से मेरा भारत महान व विश्व सरकार तक!!

मीरानपुर कटरा में निशांत दास पार्थ के प्रयत्न सराहनीय हैं। कींचड़ में ही कमल खिलता है।हम अपने आस पास व क्षेत्र में देखते है कि हर कोई जातिवाद, मजहबवाद,लोभ लालच आदि में फंस कर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक वातावरण नहीं सौंप पा रहे हैं। जुंआ, माफिया गिरी, दारू, थाना राजनीति आदि के ही बीच मासूमियत पल्लवित विकसित हो रही है। क्षेत्र के दबंग, माफिया, जातिबल, धनबल आदि सब किसी न किसी नेता के घर से होकर गुजरते हैं। ऐसे हालत पूरे देश के अंदर स्थानीय स्तर पर है।कोई भी नेता ईमानदार नौकरशाही, अफसर शाही ,पत्रकारिता आदि के समर्थन में खड़ा नहीं देखा जाता। न ही आम आदमी समस्याओं से जूझना चाहता है।


   एक ओर पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है।आखिर भारत में ऐसा क्या है,जिस कारण से भारत विश्व की निगाह में है।दलाई लामा भी कहते है,दुनिया के मुसलमानों को भारत को अपना गुरु बनाना चाहिए।आखिर ऐसा क्या है,भारत में जो अनुकरणीय है? भारत मे कुछ तो ऐसा है जो विश्व को अनुकरणीय है। वही हमारी अर्थात भारतीयों की महानता है। उसी महानता को हमें पकड़ने की जरूरत है।


  निशांत दास पार्थ ठीक कहते हैं, हमें महानताओं को हर वक्त पकड़ कर रखना है।यदि हम ऐसा कर लें तो हम 02 प्रतिशत से होकर ज्यादा हो जाएंगे। फिर पांडव पांच ही होते हैं, महाभारत से पूर्व बनबास हो सकता है लेकिन महाभारत वक्त श्रीकृष्ण रूपी आत्मा.. परम् आत्मा हर वक्त हमारे साथ रहे, यही हमारी महानता है। दुर्योधन कभी भी श्रीकृष्ण को नहीं चाह सकता।,वह तो संसाधन ही चाहेगा।हमारी महानता हमारी आत्मा, आत्मा की शक्ति है,हमारे सन्त, सन्तों की वाणियां हैं। पाकिस्तान में दो प्रतिशत हिन्दू बचे हैं। उनसे पूछो महानता क्या होती है?सद्भावना क्या होती है। कल ही हमने उनमे से एक युवा भाई से बात की, उससे पूछो मानवता, सद्भावना व चीत्कार करती मानवता का दर्द।



    महानता को प्रदर्शित क्या करता है?हमारी अमीरी, हमारा शिक्षित होना, हमारा स्वस्थ होना, हमारा ईश्वर को मानना न मानना आदि आदि?नहीं, हमने इसको भी देख लिया।ये सब ढोंग पाखण्ड बन सिर्फ।।हमारी महानता को प्रकट करता है-हमारा नजरिया, मन प्रबन्धन व आचरण प्रबन्धन।गीता से भी यही स्पष्ट होता है,कुर आन से भी। कुर आन की शुरुआती आयतें भी कहती हैं- धरती पर प्रशंसा योग्य कुछ भी नहीं सिर्फ खुदा के सिवा। इसके लिए रास्ता  आत्मा से जाता है, मन प्रबन्धन व आचरण प्रबन्धन से जाता है।
परम्+आत्मा=परमात्मा; हमारे द्वारा परम् आत्मा ही महानता घटित करवा सकती है।इसको हमारी शिक्षा, योग पूर्ण शिक्षा व आचरण ही हमारी महानता स्थापित करती है।अनेक ग्रन्थों से यही स्पष्ट होता है। अट्ठानवे प्रतिशत उस महानता को देख ही नहीं पा रहे हैं।उनका उस पर आचरण, प्रयत्न, प्रयोग तो बड़ा मुश्किल।इस लिए योग जरूरी है।मन चंगा तो कठौती में गंगा, कुम्भ में सागरसागर में कुम्भ.,वसुधैब कुटुम्बकम,सर्वेभवन्तु सुखिनः..... आदि की स्थिति योग से ही सम्भव है। जो अपने भौतिक विकास के लिए,अपनी जाति अपने मजहब के लिए, लोभ लालच के लिए दूसरे को कष्ट देने को भी नहीं चूकते तो इसका मतलब है उनका नजरिया ही गलत है।वह योग शिक्षा से ही सम्भव है। यूनेस्को, संयुक्त राष्ट्र संघ भी2002ई0 को मूल्य आधारित शिक्षा की वकालत कर चुका है।


      विद्यालय व शिक्षक, विद्यालय व शिक्षकों प्रति संस्थाओं व सरकारों का रवैया, प्रशासन व पुलिस ने की मदद, नौकरशाही व नेताशाही पर नियंत्रण व प्रशिक्षण आदि से ही ये सम्भव है। इस हेतु पुलिस, शिक्षक व संविधान रक्षक संस्थाओं की मिलीभगत की सक्रियता को क्रांतिकारी कानून की आवश्यकता है।जिसे कि ज्ञान व संविधान आधारित वातावरण बन सके व वैचारिक क्रांति, मानसिक क्रांति हो सके।इसमें योग ही सहायक है।


   योग ही हमें सन्तुलन करना सिखाता है। वह हमें बताता है-हमारे अंदर ईश्वर है।दूसरों के अंदर ईश्वर है। हमारे अंदर जो दिव्य है वह कैसे विस्तार पा सकता है?हम व जगत के तीन रूप हैं-स्थूल, सूक्ष्म व कारण।हमें पहले अपने को पहचानना जरूरी है।हम कौन हैं?हमारे हाड़ मास शरीर को एक दिन मर ही जाना है। जीवन पथ पर रोज हजारों आते हैं और जाते है। हमें महानताएं महान बनाती है।महान हमारा हाड़ मास शरीर नहीं आत्मा है।उसे परम् हो जाने का अबसर योग ही है।हमारे नजदीक हमारी विश्व सरकार है -हमारी आत्मा।जो किरण है, लहर है।जो सूरज स्वयं सूरज है,जो स्वयं सागर है। यही से विश्व बंधुत्व, विश्व सरकार, अखण्ड भारत/दक्षेस सरकार का स्वप्न उजागर होता है।


कटरा विधान सभा क्षेत्र से एक अलख जग सकती है,जो संयुक्त राष्ट्र संघ व अमेरिका आदि तक भी जा सकती है। पांच पांडव ही काफी हैं, पंच प्यारे ही काफी हैं......
#अशोकबिन्दु
#nishantdas
parth

Tuesday, 11 February 2020

भेद से ऊपर उठकर दुनिया मुट्ठी में!!!

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1252440551810649&id=100011341492358


जड़ तक कोई जाना नहीं चाहता!!आरोप प्रत्यारोप से कोई शान्ति व विकास नहीं ला सकता!!सबकी भागीदारी भी जरूरी!!!
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85 प्रतिशत+अल्पसंख्यक=राजनैतिक दशा???किस ओर संकेत दे सकती है???देश का मतलब क्या है?उस देश के रहने वाले लोग, जीवजन्तु, वनस्पति, प्रतीक चिह्न, धरोहरों का सम्मान!!!विकास!!!संरक्षण!!सबकी भागीदारी!!!आचार्य चतुर सेन/वयम रक्षाम: की माने तो आदि काल से ही संघर्ष सत्ता भागीदारी, संसाधन वितरण, सबका सम्मान आदि को लेकर था।कार्ल मार्क्स की माने तो, दुनिया को बर्बाद करने वाला सत्तावाद, पूंजीवाद, पुरोहितवाद, जातिवाद/कुल वाद/जन वाद था।इतिहास उठा कर देखें ,जन का अर्थ क्या था?जनपद का मतलब क्या था??किसी क्षेत्र का अध्ययन करें!जातिवाद,सामन्तवाद,माफियागिरी ही हावी है।क्षेत्र में कुछ परिवार हाबी रहते हैं,फिर उनके रिश्तेदार, सम्पर्की, जाति के लोग।कुछ लोग कहते है,अब कहाँ है सामन्त बाद?हम कहते रहे हैं-अभी तो भरपूर मात्रा में है सामन्तवाद।चाणक्य ने कहा है-सामन्त का अर्थ है-पड़ोसी।वार्ड/गांव/शहर के दबंग, माफिया, जातिबल आदि किसी न किसी नेता के साथ खड़े होते है,क्षेत्र में कुछ परिवारों के चारो ओर राजनीति मंडराती है। व्यवस्था परिवर्तन/जाति व्यवस्था समाप्ति पर कौन बल देता है?सन2011से2025 तक का समय देश व दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है।भविष्य उसके साथ खड़ा होगा, जो सबके साथ खड़ा होगा।ऐसे में आध्यत्मिक व मानवता ही सभी समस्याओं का हल कर सकती है।ये भी विचारणीय विषय है-किस राजनैतिक दल में नए प्रत्याशी स्थान पा रहे हैं और किस में पुराने ही ?कैसा व्यवस्था परिवर्तन??क्षेत्र में कुछ परिवारों तक राजनीति केंद्रित क्यों??


https://www.facebook.com/groups/1025404947641650/permalink/1400003973515077/


सबका साथ सबका विकास सबकी भागीदारी!!
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 मानव समाज, सत्ता व तन्त्र गड़बड़झाला हो गया है,अराजक होगया है।शायद ऐसा वैदिक काल से ही था, इसलिए वेदों को कहना पड़ा-मनुष्य बनो फिर आर्य/देव मानव बनो।हमें तो ये लगता है-अभी मनुष्य पशु मानव ही है।सुबह से शाम तक, शाम से सुबह तक हम आप सब वह करते आते हैं जो वास्तव में नहीं करना चाहिए। हर स्तर पर हमें इससे मतलब नहीं है कि क्या होना चाहिए, होने से मतलब नहीं है।हम जी कर रहे हैं-ठीक है।हम अपनी व जगत की पूर्णता (योग/आल/अल/all/आदि) के आधार पर कुछ बहु नहीं देखते।इसलिए आदिकाल से ही दुनिया आतंकवाद, असुरत्व,मनमानी, चापलूसी, लोभ लालच आदि व इसके लिए जाति, मजहब,अल्पसंख्यक, बहुसंख्यक, देशी विदेशी आदि के नाम पर विश्व व समाज को अशान्ति, अविश्वास ,हिंसा आदि में धकेलते रहते हैं।
हम प्रकृति अंश ब्रह्म अंश, प्रकृति अभियान/नियम /सुप्रबन्धन के आधार पर नहीं करते। ब्राह्मंड व जगत में सब कुछ नियम से है,चन्द तारे, जन्तु वनस्पति आदि सब नियम से हैं,सिर्फ मनुष्य की छोड़ कर।

  हमारा पूरा जीवन शिक्षा जगत में हो गया।जिनमे से 25 से वर्ष शिक्षण कार्य करते हो गए। हमने देखा है- अध्यापक, विद्यार्थी, अभिवावक, शिक्षा कमेटियों आदि के माध्यम से शिक्षा जगत, विद्यालय के तो सम्पर्क में है लेकिन मतलब अपनी सोंच से ही है।शैक्षिक मूल्यों से नहीं।उन्हें इससे मतलब नहीं क्या होना है?बस, जो हम चाहते हैं वह ठीक है।। कुर वाणी है-त्याग, नजरअंदाज करना वह जो हमेंव जगत को भविष्य में अराजक बनाने वाला है,दूसरे को कष्ट देने वाला है।

समाज, देश व विश्व में अनेक ऐसे हैं उन्हें सारी मनुष्यता, सारे विश्व से मतलब नहीं।सुर से सुरत्व से मतलब नहीं।वास्तव में धर्म व अध्यात्म से मतलब नहीं।ईश्वर से मतलब नहीं।सब,ढोंग!!!!जव सारी दुनिया सारे मनुष्य ईश्वर की देन है,तो भेद क्यों??सभी के अंदर ईश्वर की रोशनी मान कर सबका मन ही मन सम्मान नहीं। अहिंसा क्या है?यही अहिंसा है,मन मे किसी से भेद, द्वेष न रखना। हम जब तक इस दशा को प्राप्त नहीं हो जाते कि सागर में कुम्भ कुम्भ में सागर तो ईश्वर के प्रेमी कैसे??

https://www.facebook.com/groups/1025404947641650/permalink/1396428563872618/

अशोक कुमार वर्मा' 'बिंदु'
www.ashokbindu.blogspot.com

Friday, 7 February 2020

जीवन में जाति, मजहब, धर्म स्थलों आदि की नहीं रोटी कपड़ा, मकान, शिक्षा, शांति, सम्मान, सत्ता में सहभागिता आदि की जरूरत!!!

हमें कोई साधना / उपासना आदि करना है तो उसके लिए धर्मस्थल जरूरी नही है। समाज हमें किस जाति/मजहब का मानता है ये महत्वपूर्ण नहीं है।शांति, धैर्य,त्याग, समर्पण, शरणागति,सेवा आदि महत्वपूर्ण है।गुरु,आत्मा, मार्गदर्शक आदि महत्वपूर्ण है।हमें अनेक स्थानों पर गुरुद्वारों पर नाज है।जब हम समाज से त्याज्य एक मुस्लिम गर्भवती महिला को एक गुरुद्वारा में रहते हुए, जीवन यापन करते हुए व नमाज अदा करते हुए देखते हैं। जब हम दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती अपने बीमार  परिजन के साथ उपस्थित मुस्लिम परिवार को नजदीक के एक गुरुद्वार में नमाज,भोजन आवास की व्यवस्था प्राप्त करते देखते हैं।
जरूरी नहीं की  अपने देवी देवताओं की उपासना हेतु लाखों रुपए व्यय किए जाएं।महत्वपूर्ण है जिन प्राणियों में आत्मा का निवास है ,उसके लिए सुप्रबन्धन खड़ा करना,उनको सेवा देना है ।

Thursday, 23 January 2020

सुभाष की मृत्यु पर खामोश भारत की देश भक्ति!!




कोई माई का लाल देश भक्त सरकार भारत में है जो सुभाष बाबू की मृत्यु को उजागर कर दे!!

https://m.facebook.com/groups/126555337741836/wp/2484696845137756/?ext=1580049673&hash=AeSDT-l8shXsbcs0

 धन्य देश के जनता की देश भक्ति??तथाकथित देश भक्तों की देशभक्ति!!! जो नहीं जानना चाहती कि हमारे प्रिय नेता एक मात्र हमारे प्रिय नेता सुभाष बाबू के मृत्यु पर से पर्दा कोई नहीं उठ वाना चाहता!!
जिस दिन मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, उस दिन हमने पोस्ट किया था::मोदी जी को अब पता चलेगा कि देश में वास्तव में अब भी किसका शासन है?मोदी जी ने भी गोपनीयता की शपथ ले ली है,वे अब सुभाष व शास्त्री मृत्यु पर कोई एक्शन नहीं ले सकते।ये भी नहीं बता सकते कि भारत राष्ट्र मण्डल का सदस्य क्यों है?देश की  तथाकथित आजादी व विभाजन के कागज कहाँ हैं?


  हम सन1986ई से जो कहते आये उस पर लोगों ने मजाक ही उड़ाया। जनता दल सरकार के बाद सब सामने आना शुरू हुआ।। भारत की राजनीति आदि काल से ही गन्दी रही है। देश को आगे काफी कुछ झेलना होगा।।यदि नेता या जनता न नहीं जागे।

Friday, 20 July 2012

ब्लैक होल पर से रहस्य के पर्दे उठने जरुरी .

विज्ञान का ईश्वरीय कण प्रकृति की ही बात है जो कि शिव (कल्याण)कण के
अर्द्धनारीश्वर घटना (नाभिकीय विखण्डन) के बाद का है .


ब्लैकहोल के बाद अनन्त भगवान !

इस जगत मेँ जो भी ईश्वर हैँ वे इसी जगत के हैँ व बुद्धत्व को प्राप्ति के
पहले के हैँ . बुद्धत्व के बाद शून्य है .जिसके बाद फिर ब्लैक होल अवस्था
है .ब्लैक होल के बाद कहीँ अनन्त भगवान हैँ . जहाँ तक श्रीकृष्ण व
श्रीकृष्ण के साथ अर्जुन जैसे ही पहुँच सकते हैँ .



सागर मेँ हम कुम्भ !

चेतना रुपी सागर मेँ हम व हमारा जगत कुम्भ के समान है जिसमेँ भी सागर
समाया है .कुम्भ टूट टूट कर विखर भी जाता है तो भी वह सागर लीन है .हमारा
शरीर व प्रकृति चेतना के बीच ही बनती बिगड़ती है .


ब्लैक होल की खोज !
<www.akvashokbindu.blogspot.com>
ईश्वरीय कण की खोज के बाद भी काफी कुछ बाकी है खोजना .ब्लैक होल पर से
रहस्य के पर्दे उठना जरुरी है .जो भी अभी खोजा जा चुका है वह व्हाईट का
है ,अभी तो व्हाईट का ही काफी कुछ खोजा जाना बाकी है . ब्लैक का खोजना तो
काफी दूर का मसला है .वैसे तो बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद हम अद्वैत मेँ
प्रवेश कर जाते हैँ लेकिन वह अद्वैत इस जगत मेँ अन्तर्मन के लिए ही है
.बुद्धत्व के बाद शून्य के बाबजूद भी द्वैत है ,व्हाईट व ब्लैक का .ब्लैक
का खोजना बाकी रह जाता है .

BY : ASHOK KUMAR VERMA 'BINDU'
<www.twitter.com/AKVASHOKBINDU>

Thursday, 5 July 2012

मुसलमान के मायने बड़े ?

हमारे पास इण्टर के दो छात्र उपस्थित थे ,एक मुस्लिम व दूसरा हिन्दू पण्डित था .जिनसे आध्यात्मिक चर्चा चल रही थी .हिन्दू छात्र बोला ,बड़े हिन्दू होते हैँ कि मुस्लिम ? मेरी नजर मेँ तो हिन्दू बड़े होते है ?मुस्लिम हंसते हुए बोला,हिन्दू तो जाटव वाल्मीकि भी होते हैँ .कहो कि ब्राह्मण बड़ा होता है ?


मैँ बोला , रोजमर्रे की जिन्दगी मेँ न जाने कितनोँ से सामना होता है .जो किसी भी जाति या किसी भी मजहब से हो सकता है .उनमेँ कौन बड़ा है ?जो भौतिक चकाचौंध मेँ है ,उसकी नजर मेँ 'बड़ा' की परिभाषा से,जो जातिवादी व मजहबी हैँ उनकी नजर मेँ 'बड़ा' की परिभाषा से मेरी परिभाषा मेँ अंतर है .

मेरी नजर मेँ बड़ा कौन है ? जो जातिवाद ,छुआछूत ,पक्षपात ,मनमानी ,कूपमण्डूकता ,आदि से हट कर सत्य ,ज्ञान ,कानून ,उदारता,आदि के आधार पर जीवन जीता है वह बड़ा है .आपने फूलोँ व फलोँ लदी डाली को देखा होगा ,वह झुकी होती है .बड़ा वह है जो उदार व नम्र है .

हिन्दू छात्र बोला ,हिन्दू व मुसलमानोँ मेँ कौन बड़ा है ?

मुस्लिम छात्र बोला ,तू ब्राह्मण जाति का होकर भी सरजी की बात नहीँ समझ पा रहा है ?सर जी ने अभी क्या बताया ?

<www.vedquran.blogspot.com>
मैँ बोला ,हमेँ रोज मर्रे की जिन्दगी मेँ जो हिन्दू मुसलमान मिलते हैँ ,मै उनकी बात नहीँ करना चाहूँगा .उनमेँ से निन्यानवे प्रतिशत विचलित हैँ ,अज्ञानी व मजहबी हैँ .मैँ यहाँ पर शब्दोँ की बात करना चाहता हूँ .निरन्तर अभ्यास से शब्दोँ के पीछे छिपे असली मर्म को जानने के बाद हमारे भाव व विचार परिवर्तित होकर हमारा नजरिया बदलते हैँ और फिर जब हमारा नजरिया बदलता है तो विचार बदलते हैँ .
<www.antaryahoo.blogspot.com>

व्यक्ति जो शरीर से दिखता है व उसका आधा व्यक्तित्व होता है .शेष आधा व्यक्तित्व उसका उसके अंदर उसके भावनाओँ ,विचारोँ ,नजरिया ,सोँचने के ढंग मेँ होता है .
<www.akvashokbindu.blogspot.com>

हम दूसरे को पहचानने के नाम पर बड़े दम्भ मेँ होते हैँ .देखा जाये तो हम अपने को ही नहीँ पहचानते .जातिवाद ,मजहबवाद ,शारीरिक व ऐन्द्रिक आवश्यकताओँ ,आदि मेँ उलझ कर हम अपना सारा जीवन गँवा देते हैँ लेकिन अपने को नहीँ पहचान पाते .

<www.ashokbindu.blogspot.com>

हम पचास प्रतिशत ब्रह्मांश व पचास प्रतिशत प्रकृतिअंश होते हैँ अर्थात अर्द्धनारीश्वर अंश .अपने जीवन मेँ जो अशान्त व असंतुष्ट रह जाते है ,प्रकृति(शरीर ,परशरीर ,धन दौलत ,संसाधन ,आदि) पाकर भी अशान्त व असंतुष्ट रह जाते हैँ .ऐसा क्योँ ?क्योँकि ये अपने ब्रह्मांश के लिए कुछ भी नहीँ करते .यज्ञ ,धर्मस्थल ,मूर्तियाँ ,पुस्तकेँ ,तीर्थ यात्रा ,आदि सब प्रकृतिअंश ही हैँ ,अनित्य हैँ
.ब्रह्मांश के लिए हमेँ क्या करना होता है ? कुछ भी नहीँ करना होता है .सिर्फ आँख बंद करके बैठ कुछ क्रियाएँ करनी होती हैँ ,मन को शान्त व उदार रखना होता है .

<www.islaminhindi.blogspot.com>

हिन्दू के मायने मुसलमान के मायने से संकीर्ण है ,मुसलमान शब्द के मायने बड़े हैँ .मुसलमान शब्द के मायने ईमान व सत से जुड़े हैँ लेकिन हिन्दू शब्द के मायने एक क्षेत्र विशेष से जुड़े हैँ .आर्य होने के लिए हिन्दू होना आवश्यक नहीँ है.प्रत्येक आत्मा सत होती है या ईमान मेँ होती है इसलिए मेरा विचार है कि हर आत्मा मुसलमान होती है.मेरी नजर मेँ
आर्य या आत्मा का गुण हिन्दू नहीँ हो सकता .जैन ,बुद्ध ,यहूदी ,पारसी ,ईसाई ,मुसलमान ,आदि सम्भवत: आत्मा के गुण हो सकते हैँ ?या आर्य होने के लिए गुण हो सकते हैँ .

हिन्दू के मायने से मुसलमान के मायने बड़े हैँ सम्भवत: ?

Saturday, 14 April 2012

नक्सली कथा : अनुशासनहीनता

 नक्सली कथा : अनुशासनहीनता
उत्तर प्रदेश के जनपद सोनभद्र का एक गांव कुर्मेठानवीपुर जो
सुन्दरी शहर से बीस किलोमीटर , के प्राईमरी स्कूल मेँ एक शिक्षक थे -
दिव्यसुत जाटव . स्कूल के हेडमास्टर व अन्य अध्यापिकाओं का वह कोई सहयोग
नहीं करता था शिक्षण कार्य व अपने दायित्वों के निर्वाह सिवा . इस कारण
हेडमास्टर, अध्यापिकाएं व ग्रामप्रधान उस पर अनुशासनहीनता का आरोप लगाते
रहते थे. ग्रामप्रधान के विरोधी ग्रामीण उसके सहयोग के लिए तैयार रहते थे
लेकिन वह उनका सहयोग लेना पसंद नहीँ करता था सिवा कुछ तटस्थ व ईमानदार
ग्रामीणोँ के सिवा .

स्कूल मेँ विभिन्न कार्योँ के लिए आया धन जो ग्रामप्रधान के सहयोग
से हेडमास्टर व अध्यापिकाएं हजम कर जाती थीं,का कुछ हिस्सा दिव्यसुत जाटव
को भी देने की कोशिस की गयी थी जब वह यहां नियुक्त हुआ था .

डेढ़ साल बाद असंतुष्टि व असंतोष के बीच से निकल कर वह डायट
मेँ आ गया.बोर्ड परीक्षा के दौरान उसे टीम एक साथ परीक्षाकेन्द्रों के
निरीक्षण पर लगा दिया गया था .

* * *

उस दिन 19 नवम्बर 2017 !

मुरी शहर की मुख्य सड़केँ इन्दिरा गांधी से सम्बंधित पोस्टरों
एवं कांग्रेसी झण्डों से सजी थी .एक मकान की तीसरी मंजिल से एक युवक ललक
यादव खिड़की से पर्दा हटाकर नीचे सड़क पर गुजरती बच्चों की रैली देख रहा
था.उसकी प्रेमिका गौरी उसके समीप खड़ी थी.कुछ मिनट के लिए वह गौरी की
बाँहों मेँ था लेकिन मन एक षडयंत्र मेँ ...?! एक घण्टा बाद वह रिवाल्वर
लिए अपने भाई मर्म यादव के सामने था.

आखिर मर्म यादव के अत्याचारों से नगर को मुक्ति कौन दिलाता ?शासन
प्रशासन भी सुनने को तैयार न था कुरुशान (गीता) से धर्मयुद्ध की सीख
लिया ललक यादव कि धर्म के रास्ते पर अपना कोई नहीँ होता.ललक यादव अब जेल
मेँ था.उसे कुछ दिनोँ के लिए प्रशासनिक पूछताछ के लिए सुन्दरी शहर लाया
गया था .जहाँ एक दिन उसे प्रशासन को रोकना पड़ा .दिव्यसुत जाटव से उसकी
मुलाकात हुई .


मनमानी पर खड़ा तंत्र . जिसमेँ सहयोग न करना तंत्र के मुखियाओं ने
आजकल अनुशासनहीनता मान लिया है और इस अनुशासनहीनतंत्र के खिलाफ जो अपनी
अंगुली टेंढ़ी कर लेता है वह इन मुखियाओँ की नजर मेँ नक्सली हो जाता है या
अच्छा नहीँ रह जाता है .सत्य को मुँह पर कहने वाला परिवार ,समाज व
संस्थाओँ मेँ लोगोँ की नजर से उतर जाता है .


बोर्ड परीक्षा के दौरान दिव्यसुत जाटव अपनी टीम के साथ एक
परीक्षा केन्द्र - 'अमर बालेन्द्र विद्यावती इण्टर कालेज,मिर्जापुर
कल्याण,जिला सोनभद्र ' मेँ जीप से प्रवेश किया तो कालेज मेँ शान्ति छा
गयी .
जब जीप से दिव्यसुत जाटव नीचे उतरा तो लोगों ने चैन की साँस ली .


लेकिन क्योँ ....?
आज से पांच वर्ष पूर्व सन 2012 ई0 मेँ दिव्यसुत जाटव इसी कालेज मेँ
अध्यापक था.ये कालेज तथाकथित बनियोँ व ब्राह्मणोँ के निजी सोंच सोंच से
चल रहा था.जहां लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्योँ से हटकर मनमानी,जातिवाद
,चापलूसी ,हाँहजूरी,टयूशन,अभिभावक प्रधानता,आदि का वर्चस्व था.उनकी
व्यवस्था मेँ सहयोगी न होने के कारण दिव्यसुत जाटव पर अनुशासनहीनता के
आरोप थे.एक वर्ष बोर्ड परीक्षा के ही दौरान एक दिन इसी कालेज मेँ वह
डयूटी कर रहा था .परीक्षाकक्ष मेँ उसके साथ एक अन्य अध्यापक डयूटी कर रहे
थे जो कुछ परीक्षार्थियोँ की नकल मेँ मदद कर रहे थे. दिव्यसुत जाटव ने
उन्हेँ अनेक बार टोंका लेकिन वे अपनी हरकत से बाज नहीँ आये.जब वे एक
बच्चे की कापी ही लिखने लगे तो दिव्यसुत जाटव को न रहा गया और वह कक्ष से
बाहर आ गया.

"मैँ यहाँ डयूटी करने आया हूँ ,नकलचियोँ व नकलमाफियाओँ की हरकतोँ पर मौन
रहने नहीँ."

लेकिन दिव्यसुत जाटव की कोई मदद नहीं . हाँ , अगले दिनों उसे
परीक्षा डयूटी पर अवश्य नहीँ लगाया गया और अगले वर्ष बोर्डपरीक्षा के
दौरान अन्यत्र परीक्षाकेद्र पर रिलीव दिया गया जहाँ तो ओर भी हालत नाजुक
.पहले दिन डयूटी के बाद वह फिर आखिरी दिन पहुँचा .

"डयूटी ,कैसी डयूटी ?नकलचियों व नकलमाफियों की सेवा करना डयूटी ? "

दिव्यसुत जाटव जीप से निकलकर अपनी टीम के साथ आगे बढ़ गया.आगे बढ़कर
एक उस कमरे के सामने जा पहुँचा जिसके दरबाजे पर ताला लगा था.

"इसे खुलवाओ ."
कालेज मेँ काफी फोर्स आ पहुँची.
"चाबी कहीँ खोगयी है "

"झूठ मत बोलो ,हम जैसे अनुशासनहीन व्यक्ति बोलेँ तो ठीक है ."

सिपाहियोँ ने आकर ताला तोड़ दिया .कमरे के अंदर बैठे एक अध्यापक को
गिरफ्तार करवाते हुए "कापी और पेपर कहाँ है ? "
"झूठ मत बोलो ,असलियत लाखोँ लोगों तक पहुंच चुकी है .प्रत्येक कमरे
मेँ कैमरे फिट हैं ."

इसके बाद -
सभी कक्षनिरीक्षकों व केन्द्रव्यवस्थापक को गिरफ्तार कर लिया गया और
केन्द्र को निरस्त कर दिया गया.

दिव्यसुत जाटव बोला -"तुम्हारे तंत्र मेँ मैँ अनुशासनहीन था लेकिन
अब मैँ स्वयं अपना तंत्र खड़ा कर चुका हूँ और अपनी एक प्राइवेट जासूस
एजेंसी बना चुका हूँ "

































Thursday, 8 March 2012

08मार्च ,महिला दिवस : तो फिर क्योँ प्रतिवर्ष 5लाख बालिकाएं मार दी जाती हैँ

होली के अवसर पर मानवता के प्रेम,उदारता ,सेवा,विवेक,ज्ञान,आदि रंगों से सरावोर होते हुए आज महिला दिवस पर कुछ विचार
दे रहा हूँ . भारतीय नारीसमाज का यथार्थ भौतिक भोगवाद का शिकार हो चुका है. यहाँ वह धार्मिक उत्सवोँ ,धर्मस्थलोँ, आदि मेँ संख्या से पुरुषोँ की अपेक्षा ज्यादा नजर आती हैँ लेकिन उनके भी व्यवहारिक जीवन नजरिये मेँ धर्म, अध्यात्म व ज्ञान गायब होता है .

किसी ने भा+रत से अभिप्राय बताया है-प्रकाश मेँ रत.आइंस्टीन ने कहा है कि हमेँ हर वस्तु प्रकाशवान दिखाई देती है . हम सब पचास प्रतिशत ब्रह्मांश हैँ और पचास प्रतिशत प्रकृतिअंश हैँ . ब्रह्मांश अलिंगी होता है,प्रकृतिअंश ही स्त्री या पुरुष है.


यदि ईश्वरीय प्रकाश कण -कण मेँ है तो हमारे प्रकृतिअंश अर्थात हमारे शरीर मेँ भी वह है .जो ब्रह्मांश ही है .जिसको जाने बिना हमारा धर्म या अध्यात्म पाखण्ड है .ये सब क्योँ ? आज महिला दिवस पर ऐसी बातेँ क्योँ ? ऐसा इसलिए क्योँकि हम अपने को जाने , अपने को जान लेने के बाद चाहेँ स्त्री हो या पुरुष हम सभी समस्याओँ से मुक्त हो जाएंगे . सिर्फ सशक्त कानून, सभी शास्त्रोँ के
ज्ञान,धर्मस्थलोँ के सम्मान, भौतिक संसाधन , आदि से मानव का कल्याण नहीँ होने वाला .

नारी हो या पुरुष उसे ज्ञानी,उदार,सेवक,अहंकार शून्य,साहसी,धैर्यवान,परोपकारी,चरित्रवान,आदि होना आवश्यक है.


नारी की समस्या क्या है ?नारी तो हर समस्या का समाधान है तो ऐसे मेँ फिर नारी की क्या समस्या?यदि समस्याएं हैँ तो इसके लिए नारी ही दोषी है.वह प्रथम शिक्षिका है माँ के रुप मेँ.


एक भारतीय महिला की एक झलक :


* * * * *

हमारी नजर मेँ एक अविवाहित महिला है .मेरे संज्ञान मेँ है कि जब वह शादी होकर अपने मायके से अपने ससुराल पहुँची तो उसे अपने ससुराल पक्ष से उपेक्षा व तिस्कार का ही सामना करना पड़ा लेकिन उसने धैर्य,शान्ति ,विवेक,उदारता, प्रेम,सम्वाद शैली,सेवा,चतुरई,आदि के सहयोग से काम लिया.जब उसके मायके वालोँ को मालूम चला कि उसकी ससुराल के लोग दुष्ट हैँ तो वे उग्र हो हस्तक्षेप करने के लिए
तैयार हो गये लेकिन उस महिला ने रोक लिया और कहा कि मैँ ही काफी हूँ .


" दो साल से तू उनकी दुष्टता बर्दाश्त कर रही है ." "भैया जी,मैँ बर्दाश्त नहीँ कर रही हुँ .मैँ........."


"पवन!खामोश क्योँ हो गयी तू .?"

"मैँ औरत जाति से हूँ ,मेरे सर जी मुझे मेरी निजता का रास्ता बता चुके है .मैँ जानती हूँ कि मेरे अन्दर क्या क्या है.मैँ औरत नहीँ यदि मैँ अपने ससुरालियोँ को न बदल न सकूँ ."

फिर ....?!


फिर पवन ने आगामी दो साल मेँ अपनी ससुरालियोँ के व्यवहार मेँ चेंजिंग कर दी.

अस्सी प्रतिशत से ऊपर दहेज प्रकरण झूठे .


* * * * * *

मानव सत्ता के दो भाग हैँ -पुरुष व स्त्री .दोनोँ का समअस्तित्व (श्रीअर्द्धनारीश्वरशक्ति) ही मानव सत्ता को जगत मेँ सम्मानित रख सकता है.पुरुषोँ की तरह स्त्रियोँ को भी स्वयं को जानना जरूरी है . स्त्री हो या पुरुष,हम सब पचास प्रतिशत ब्रह्मांश हैँ पचास प्रतिशत प्रकृतिअंश .हम सिर्फ प्रकृतिअंश से ही स्त्री या पुरुष हैं.अपने को पहचाने से हमारी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी.

एक सर्वेक्षण के अनुसार दाम्पत्य जीवन को बनाने व बिगाड़ने का दायित्व स्त्री का ही है .मेरा मानना है कि अस्सी प्रतिशत से ज्यादा दहेज प्रकरण झूठे होते हैँ .

Thursday, 2 February 2012

नक्सली कहानी : मराठों बिच उत्तरी !

मुम्बई की एक सड़क के किनारे एक युवक ठेले से फल बेँच रहा था .मराठा दल के कुछ युवक तलवारेँ व डण्डा लेकर आ गये .वे मराठी भाषा मेँ चीखते व चिल्लाते जा रहे थे . जिसका हिन्दी मेँ मतलब था- मुम्बई मराठोँ की है .इन साले उत्तरीयोँ को कुचलोँ मारो ,जब तक मुम्बई छोँड़ कर भाग न जायेँ.


मराठा दल के युवक हिन्दीभाषियोँ की दुकानोँ ,ठेलोँ ,आदि को उजाड़ने लगे व दुकानदारोँ से मारपीट करने लगे.जब वे कुछ मुस्लिम युवकोँ की दुकानोँ पर तोड़फोड़ व उजाड़ करने लगे व एक फल के ठेले वाले को ललकारा तो ठेले वाला युवक स्वयं अपना ठेला पलट कर सीना तान खड़ा हो गया और चीखा- मैं भारतीय मुसलमान हूँ भारतीय मुसलमान ,बोलो मेरा प्रदेश कौन सा है ? बोलो .मैँ कहाँ जाऊँ ?

इसके बाद आसपड़ोस से मुसलमान ठण्डे ,लाठी,आदि लेकर इकट्ठे होने लगे . मराठा दल वाले भाग खड़े हुए .



मराठा दल के द्वारा एक अधेड़ ब्यक्ति मारा जा चुका था.जो फुटपाथ पर एक स्थान पर चाय बना कर बेँचता था .उसका बेटा जो की नक्सलियोँ के लिए काम करने लगा था ,उसका नाम था दिव्य धोबी. दोनोँ पाँच साल पहले ही अपना गांव छोड़ कर मुम्बई आ गये थे . नासिक से पच्चीस किलोमीटर दूर एक गांव 'अहिरान कूर्म' गांव मेँ इनके साथ एक घटना घट गयी थी .
पांच वर्ष पूर्व 'अहिरान कूर्म' गांव मेँ दिव्य धोबी .....!?दिव्य धोबी
गांव से एक किलोमीटर दूर स्थित एक कालेज 'कूर्मांचल यदु इण्टर कालेज, कुरु बिहार ,अहिरान कूर्म ,नासिक' मेँ कक्षा बारह का छात्र था. जिसकी बड़ी बहिन दिव्या देवी इसी कालेज मेँ अध्यापिका थी .कालेज के प्रधानाचार्य थे -तिलक व जटाधारी नरदेव शास्त्री . दिव्या देवी के प्रति जिसकी नियति ठीक नहीं थी . नरदेव शास्त्री का एक भाई मराठा दल का नगर अध्यक्ष था,जिससे पूरा नगर उसकी दबंगयी व मनमानी
से परेशान था विशेष कर सीधे साधे व सज्जन.


दिव्या देवी पर काफी दबाव था .उसका वश चलता तो वह कालेज के गेट की ओर देखना तक पसंद नहीं करती लेकिन पारिवारिक आर्थिक तंगी ने अनेक समस्याएं पैदा कर रखी थीँ .अधेड़ पिता परचूनी की दूकान चला तो रहे थे लेकिन दुकान की आमदनी से चार लड़कियों व दो लड़कों को पालना व उनकी शिक्षा व स्वास्थय की व्यवस्था बनाए रखना बड़ा कठिन था और ऊपर से जवान दो लड़कियों के शादी हेतु धन की व्यवस्था करने की
चिन्ता.दिव्या की माँ रागिनी देवी रक्त कैँसर से पीड़ित थी ,जिसके इलाज का खर्चा . दिव्या देवी अपने चरित्र से नहीं फिसली लेकिन नरदेव शास्त्री की छेंड़खानी बढ़ गयी .आखिर अवसर पाकर वह व कालेज प्रबंधक कालिका देव कुणवी दिव्या देवी का रेप कर बैठे .जब अनेक प्रलोभन के बाबजूद वह शान्त न हुई तो ....?! दिव्या देवी की हत्या कर दी गयी.कालेज का एक अध्यापक जावेद अली पटेल जब वहाँ पहुंचा तो उसे
खामोश रहने के लिए कहा गया .

लेकिन ....?!

"मैं मुसलमान हूँ , मुसलमान .( जावेद अली पटेल ने अपने मोबाइल से किसी नम्बर पर कालिंग प्रारम्भ कर दी थी) मैँ काफिर नहीं हूँ जो सत से मुकर जाये.नरदेव शास्त्री तूने अपनी बेटी की उम्र की दिव्या से कुकर्म कर उसकी हत्या कर दी ? मेरे पास तेरे खिलाफ अनेक सबूत हैं .अब तू...."

* * * * *


दिव्य धोबी को जावेद अली के माबाईल से कालिँग से स्थिति का संज्ञान हो गया था.जावेद अली दिव्या देवी की हत्या के आरोप मेँ जेल मेँ था जहाँ जेल प्रशासन के अनुसार उसने आत्महत्या की थी लेकिन दिव्य धोबी के साथ साथ हिन्दीभाषी व मुस्लिम जनता इसे हत्या मान रही थी.मीडिया के पास भी असलियत पहुँच चुकी थी.जेल के अन्दर बंद नक्सली जावेद अली पटेल के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठ गये थे. नरदेव
शास्त्री का भाई -रविकान्त ,जो कि मराठा दल से था - हिन्दू मुस्लिम रंग दे साम्प्रदायिक दंगे करवाने की योजना बना बैठा.ऐसे मेँ साम्प्रदायिक दंगों के बीच दिव्य धोबी के साथ कुछ चंद लोग रह गये जो स्वयं उसके व जावेद अली पटेल के परिवार से थे.आखिर मेँ फिर नक्सली नेता दिव्य धोबी की मदद करने को सामने आये और कुछ मुसलमानोँ के सहयोग से कालेज के प्रधानाचार्य व प्रबंधक की भी हत्या कर दी
गयी ,जिस पर साम्प्रदायिक दंगो की चादर चढ़ गयी.

पाँच साल बाद अब मुम्बई !

मराठा दल के युवक दिव्य धोबी के पिता की हत्या कर चुके थे. रविकान्त वर्तमान मेँ विधायक था.जिसके आवास को हिन्दी भाषियों व मुसलमानोँ ने घेर रखा था.दो दिन बाद जिन पर लाठी चार्ज कर दी गयी.दिव्य धोबी ने अपने नक्सली साथियों के

पूना के एक होटल को घेर लिया जहाँ रविकान्त एक कमरे मेँ युवतियोँ से अपने शरीर मेँ मालिश करवा रहा था.चंद मिनट बाद जिसकी हत्या कर दी गयी .

Wednesday, 4 January 2012

नक्सली कहानी : ठाकुर बनाम क्षत्रिय

झारखण्ड का एक गांव -कुरमाढेर नवीराम.नक्सलियों के खिलाफ शासन ने अपना वज्र आपरेशन तेज कर रखा था .इस गांव मेँ लगभग एक दर्जन भर नक्सली आकर छिप गये थे.जिन्हें गांव के दबंग ठाकुर जयेन्द्र सिंह ने अपने यहां आश्रय दे रखा था.गांव मेँ ही एक युवक रहता था -हरेन्द्र वाल्मीकि.जिसके पास मकान नाम से कुछ छप्पर पड़े थे तथा एक कमरा मिट्टी का बना रखा था ,जिसकी दीवारेँ व छत मिट्टी की बनी थी.घर
उसकी पत्नी व एक तीन वर्षीय लड़की थी.वह अपना जीवन अपनी ही जगह मेँ खड़े पीपल वृक्ष के नीचे पड़ी झोपड़ी मेँ एक साधक के रुप मेँ बिताता था .जहां वाल्मीकि समाज के नर नारी पूजा पाठ करने आते रहते थे.


जब हरेन्द्र वाल्मीकि को पता चला कि ठाकुर जयेन्द्र सिँह ने अपने यहां नक्सली छिपा रखे हैँ तो -

"भाई ये आज के ठाकुर हैँ .कायर तो विल्कुल नहीँ हैँ.इनका उद्धेश्य है जीवन मेँ धर्म व सच्चाई के सामने सीना तान कर चलना.ये अधर्म व झूठ के सामने विल्कुल नहीँ झुकते,ठाकुर हैँ न ?मैने जब आज के व ऋग्वैदिक कालीन क्षत्रियोँ मेँ अंतर व्यक्त करते हुए जब भी समाज मेँ ताल ठोँक कर अपने को क्षत्रिय कहा है तो साला कौन इनमेँ व वामनोँ से मेरे समर्थन मेँ आया ? हाँ ,ये जन हमारे विरोध मेँ अपना
झण्डा व डण्डा लिए जरुर खड़े मिले हैँ . "


आज से पांच वर्ष पूर्व की घटना है .हरेन्द्र वाल्मीकि का एक भाई था -शीतेन्द्र वाल्मीकि . वह अपनी आंखों के सामने एक गरीब व दलित बालिका पर अत्याचार होते कैसे देख सकता था ?कुछ दबंग ठाकुर लड़कोँ ने उस बालिका के साथ दुष्कर्म किया ही था,अब उसकी चांद गंजी व चेहरा काला कर उसे एक गधे पर बैठा कर गांव भर मेँ घुमा रहे थे और उसकी गंजे सिर पर जूते चप्पल मार रहे थे.शीतेन्द्र वाल्मीकि को न रहा
गया और दबंगोँ का विरोध कर बैठा.वह बालिका तो भाग कर गांव से बाहर आ गयी थी लेकिन दबंगों ने शीतेन्द्र वाल्मीकि की हत्या कर दी थी.

अब हरेन्द्र वाल्मीकि ,हरेन्द्र वाल्मीकि ठाकुर जयेन्द्र सिँह की बैठक के सामने जा पहुँचा .ठाकुरोँ के बीच एक मात्र क्षत्रिय साहस के खड़ा प्रतिकार कर रहा था.


वह बोलता -वह क्षत्रिय नहीँ जो समाज व मानवता की रक्षा के लिए साहस के साथ न खड़ा हो सके .आप लोग ठाकुर होकर भी अपने हित के लिए अपराधियोँ को गले लगाते रहे हो व अन्य को कष्ट देते रहे हो .नक्सलियोँ को आश्रय क्योँ ?


* * *
हरेन्द्र वाल्मीकि ने अनेक अधिकारियोँ को स्थिति से अवगत करा दिया था .सैन्य टुकड़ियां गांव आ पहुँची थीँ.गांव के दबंग ठाकुरोँ से बच भागी वह बालिका अब जवान हो चुकी थी जो अब एक न्यूज चैनल मेँ रिपोर्टर बन गांव मेँ आयी हुई थी.वह अर्थात स्तम्भी जाटव हरेन्द्र वाल्मीकि व कुछ नेताओँ के साथ गांव मेँ घूम घूम लोगोँ को समझा रही थी कि तुम लोग अपने अन्दर क्षत्रियत्व को जगाओ,क्योँ न
तुम किसी जाति से हो.शूद्रता अर्थात तम से भला नहीँ होने वाला. उसका जीवन निरर्थक है जिसके जीवन मेँ ऐसा कोई लक्ष्य नहीँ जिसके लिए वह मर सके .ज्ञान ,साहस व संसाधन के बिना हमारा जीवन क्या जीवन?अपने नजरिये व आचरण को महापुरुषोँ के दर्शन के आधार पर रखना चाहिए न कि भेड़ की चाल या फिर सिर्फ अपनी ऐन्द्रिक आवश्यकताओँ के आधार पर.सिर्फ महापुरुषों को ताख मेँ रख अगरवत्ती,फूल,आदि चढ़ाने व
अपना सिर झुकाने से काम न चलने वाला.इससे तो तुम्हारी स्वयं की शक्ति कमजोर पड़ी है व 'स्व' पर भरोसा कम 'पर' पे ज्यादा हुआ है .कायरता का जीवन जीना क्योँ ? या अज्ञानता वश अपनी ही धुन मेँ जीना क्योँ ?


* * *


ग्रामीणोँ के सहयोग से सैन्य कार्यवाही मेँ नक्सली व नक्सलियोँ और अपराधियों को सहयोग देने वाले ठाकुर जयेन्द्र सिंह की हत्या कर दी गयी.जिसके विरोध मेँ देश की ठाकुर जाति सड़क पर उतर पड़ी और जाटवोँ व वाल्मीकियोँ से उनका संघर्ष आरम्भ हो गया.हरेन्द्र वाल्मीकि को मीडिया के सामने कहना पड़ा - बड़े होने का मतलब माया ,मोह ,लोभ,काम या अहंकार मेँ आकर अपनी मनमानी करना नहीँ है.हमेँ
धैर्य,साहस व अपने विवेक को बनाये रखना है .हमेँ द्वेषभावना मेँ आकर कोई कदम नहीँ उठाना है .हम तो द्रोह अर्थात अधर्म की खिलाफत के पक्षधर रहे हैँ . स्तम्भी जाटव के नक्सली होने के सवाल पर हरेन्द्र वाल्मीकि ने कहा कि स्तम्भी जाटव ' नक्सली वैचारिक टैंक ' की सदस्य बनी है जो नक्सली हिँसा के खिलाफ है .

Monday, 7 November 2011

कथांश : कैकुवाद.....

बंगाल का इक्तादार था -बुगरा खाँ . उसका पिता बलबन देश का राजा था जो अपने बड़े पुत्र मुहम्मद एवं उसके पुत्र कैखुसरव को काफी चाहता था . उस समय दिल्ली के कोतवाल पद पर था -फखरुद्दीन मुहम्मद.कैकुवाद बुगरा खाँ का पुत्र था.जो शरीर से सुन्दर था ही सुसभ्य एवं उदार भी था.


एक गांव के बाहर एक फकीर बाबा रहा करते थे . कैकुवाद के कहने पर उसके पिता बुगरा खाँ ने फकीर बाबा को जमीन दिलवा दी थी . हर सप्ताह एक बार अवश्य कैकुवाद फकीर बाबा से मिलने पहुँच जाता और उनके सत्संग मेँ काफी घण्टे रहता .


"कैकु,तू एक नेक इंसान बनेगा यदि मेरे सत्संग पर ध्यान देता रहा. कुछ शक्तियां तुझे फँसाने का कार्य करेंगी."


"बाबा!मेरे पिता को आप जानते हैँ . वे नई नई स्त्रियों के बीच व्यस्त रहते हैं . अपने दायित्वों को भूल जाते हैं . ऐसे मेँ मुझे ताज्जुब होता है कि मैँ उनका बेटा हूँ.."

"कैकू,तू एक हीरे के समान है लेकिन तेरे चारो जो धूल है वह तेरी चमक को मन्द कर देगी . सत्ता ने वैसे भी क्या दिया है आम इन्सान को ?मैं देख रहा हूँ तुझे सत्ता के गलियारे अपने मेँ घसीट कर तुम्हारे अस्तित्व को मिटाने का प्रयत्न करेंगे."

"बाबा,मैँ बस आपकी शरण मेँ रहना चाहता हूँ.मैँ वास्तविक खुशी चाहता हूँ न कि खुशी की वह चमक जो दुनिया को तो दिखायी दे लेकिन मुझे न दिखायी दे."

"कैकू,सुख दुख नाम की कोई चीज दुनिया मेँ नहीं है,यह सब तो ख्याली है."

"बाबा,मुझे खुशी है कि सुल्तान बाबा मुझे उत्तराधिकारी नहीं बनना चहते हैं हालांकि कोतवाल साहब मुझे उकसा रहे हैँ."

"तू खुद महसूस करता है कि सुल्तान के बाद तू सत्ता पा भी गया तो तेरे चारो ओर मड़राने वाले तेरे द्वारा भला नहीं होने देँगे.तुम जैसे सुसभ्य,उदार,शिक्षित सत्ता पा कर अच्छे नेतृत्व मेँ राज्य का भला कर सकते हैँ लेकिन सत्ता के नेतृत्व मेँ राज्य का भला कर सकते हैं लेकिन सत्ता के गलियारोँ के व्यक्तियों की आंखों के किरकिरी भी हो सकते हैं क्योंकि वो लोग बेईमान एवं मतलबी होते हैँ.."


"बाबा!सुल्तान बाबा की सलामती की दुआ क्यों नहीं करते हैँ आप?वे सलामत रहें.उनकी बागडोर राज्य के हित मेँ है."


"लेकिन तेरे बाबा कब तक चलेंगे?कुदरत के खेल को कौन मेट सकता है?सुल्तान काफी उम्र के हो चुके हैं फिर मौत तो जिन्दगी का एक सत्य है.वे कब तक जिन्दा रहेँगे ?उनके बाद कैखुसरब सत्ता संभालेगा.अभी तो सब ठीक है,सुल्तान के बाद क्या होगा?यह एक बड़ा सवाल है."


* * *


प्रात: काल का समय!

यमुना नदी मेँ सूरज की किरणें चमकने लगी थीँ.एक मछुआरे को एक व्यक्ति की चादर से लिपटी लाश मिल गयी .

"अरे,इसकी तो श्वांसे चल रही हैँ."


मछुआरे ने युवक से लिपटी चादर को हटा दिया .

"इसकी उम्र क्या होगी?तीस पैतीस से ज्यादा का न होगा लेकिन लकवा मारा लगता है.?"-एक युवती से मछुआरा बोला.

"इसको घर ले चलते हैं."


फिर उस युवक को दोनों अपने घर ले आये.


* * *


बलबन की मृत्यु के बाद कोतवाल फखरुद्दीन मुहम्मद ने षड़यन्त रच कर कैकुवाद को सुल्तान घोषित करवा दिया .कैखुसरब एवं उसके परिवार से वह नफरत करता था ,जिसे उसने डरा धमका कर मुल्तान भिजवा दिया था .इसके बाद सत्ता मेँ फखरुद्दीन के दमाद निजामुद्दीन का हस्तेक्षप एवं मनमानी बढ़ गयी . उसने अपने कुचक्र एवं महत्वाकांक्षा से ध्यान हटाने के लिए कैकुबाद की भावनाओं को जगा कर कैकुबाद को
बिलासिता में धकेल गद्दी पाने के प्रयत्न प्रारम्भ कर दिए . फखरुद्दीन ने उसे काफी समझाने का प्रयत्न किया . तुर्क सरदार निजामुद्दीन के विरोध मेँ आ खड़े हुए और कैकुबाद के पिता बुगरा खाँ को सूचित किया और कैकुबाद से मुलाकात करवायी . अपने पिता के कहने पर कैकुबाद ने निजामुद्दीन की हत्या करवा दी .निजामुद्दीन की हत्या के बाद सत्ता मेँ स्वच्छता एवं सुदृढता आ गयी लेकिन
........जलालुद्दीन फिरोज खिलजी को सेना का सेनापति बनाने के कारण तुर्क सरदार कैकुबाद से असन्तुष्ट हो गये . गैरतुर्क सरदारों की हत्या की जाने लगी .


कैकुबाद रोगी हो लकवा का शिकार हो चुका था .


आगे चल कर जलालुद्दीन खिलजी की शक्ति का विकास हुआ .तुर्क सरदारों ने सुल्तान कैकुबाद को उसकी अस्वस्थता के कारण उसके स्थान पर उसके तीन वर्षीय पुत्र क्यूमर्स उर्फ शमसुद्दीन को सुल्तान घोषित कर दिया और जलालुद्दीन खिलजी के हत्या की योजना बना ली .जलालुद्दीन खिलजी अपने विद्रोहियों को दबाते हुए स्वयं सुल्तान शमसुद्दीन का संरक्षक बन गया .तीन माह बाद उसने सुल्तान शमसुद्दीन
की हत्या करवा कर कैकुबाद को एक चादर मेँ लिपेट कर यमुना मेँ डलवा दिया .


मछुआरे की कुटिया में लेटा लेटा कैकुबाद सोंच रहा था-

"मैं क्या था ,क्या हो गया ?फखरुद्दीन के कहने पर राज्य की सत्ता मेँ आ गया.राज्य की सत्ता संभालना तो दूर अपनी सत्ता तक न संभाल सका . अपने पर ही शासन न कर सका.."


फकीर बाबा की बातें उसे स्मरण हो आयीं -

"इन्सान औरों पर शासन करना चाहता है लेकिन आश्चर्य कि अपने पर शासन नहीं कर पाता."


धीरे धीरे मन्द चाल मेँ कैकुबाद कुटिया से बाहर आ गया . वह सोंचता जा रहा था -"मुझे अब शेष जीवन अज्ञातबास मेँ रह कर फकीर बाबा की शिक्षाओं के आधार पर जीना है."

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी को सेना का सेनापति बनाना क्या कैकुबाद के लिए उचित था?और फिर गैरतुर्क सरदारों की हत्या पर कैकुबाद नियंत्रण क्यों न कर सका ?

Thursday, 3 November 2011

श्रीराम शर्मा जन्म शताब्दी महोत्सव : वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के लिए चिरस्मरणीय श्रीराम शर्मा जी

महापुरुष आते हैं और चले जाते हैं लेकिन निशानियां छोंड़ जाते हैँ . जो उनकी उपस्थिति मेँ उनकी शरण मेँ आ जाते हैं उनका उद्धार हो जाता है शेष तो भीड़ का ही हिस्सा बन कर रह जाते हैँ.इन दिनों गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य जी का जन्म शताब्दी महोत्सव है.श्रीराम शर्मा को वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के लिए हमेसा याद किया जाएगा.

धर्म,दर्शन और विज्ञान तीन प्रबल विचार शक्तियां हैं ,किन्तु इनका अलगाव और आपसी टकराव मानव जीवन मेँ वरदानों की सृष्टि नहीं कर सकता . श्रीराम शर्मा वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के लिए हमारे सदा प्रेरणा स्रोत रहेंगे.धर्म दर्शन व विज्ञान का मिश्रण कर उन्होने हमेँ जो रसानन्द दिया है उसके लिए हम सदा ऋणी रहेंगे.हम उनकी निशानियों से जुड़े रहेंगे लेकिन उनसे सम्वंधित संस्थानों के सगुण उपासना सम्बंधी कार्यक्रमों मेँ सम्मिलित होने का इच्छुक नहीं रहा हूँ. मैं तो प्राणायाम , स्वाध्याय .अध्ययन ,शास्त्रार्थ व मेडिटेशन पर विश्वास रखता हूँ .

शर्मा जी ने ठीक ही कहा है कि मनुष्य कुछ और नहीं ,भटका हुआ देवता है.दरअसल मानव अभी अपने को ही नहीं पहचाना है .स्थूल मेँ जीता है.


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Wednesday, 2 November 2011

पीस पार्टी व मु. अय्यूब : कांग्रेस का विकल्प

इन दिनों अनेक राजनैतिक पार्टियों की बाढ़ सी आ गयी है जिनमे एक पार्टी पीस पार्टी का बढ़ता जनाधार देख कर लोग अचम्भे मेँ हैँ. 10फरवरी2008को स्थापित पीस पार्टी से आज की तारीख मेँ कोई बच्चा तक अन्जान नहीं है.पीस पार्टी गरीब आदमी की आवाज बनती जा रही है.पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अय्यूब के भाषण हमेँ भी प्रभावित करते रहे हैँ लेकिन जैसा कि ये नारा दिए हैँ कि एकता का राज चलेगा हिन्दू मुस्लिम साथ चलेगा ,पर कुछ शंकाएं हैँ.मैं पीस पार्टी के नेताओं के मोबाइल नम्बरों पर मैसेज भेजता रहा हूँ कि कैसे एकता का राज चलेगा?क्या आप जन देश व अन्य देशों के पुरातत्विक स्रोतों के सच को स्वीकार कर सकोगे?आप कटटर मुस्लिमों व कटटर गैरमुस्लिमों से कैसे निपटोगे?फिर देश के हित में कुछ कठोर निर्णय होने हैं जो कि वोटों की राजनीति से ऊपर उठे बिना सम्भव नहीं है.

एक संकल्प : नारको परीक्षण की अनिवार्यता


मैं बचपन से ही कुछ ऐसे हालात जिया हूँ जब मुझे लगा है कि गवाह ,सबूत व जन बल का अपने पक्ष या विपक्ष मेँ होना काफी नहीं है .हर हालात मेँ नारको परीक्षण व ब्रेन मेपिंग अनिवार्य होना चाहिए.पीस पार्टी जिसका समर्थन करती है


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Sunday, 30 October 2011

इल्तुतमिश : भारतीय कमजोरियों की नींव पर सल्तनत का सपना

नदी के किनारे कुछ बच्चे एक बच्चे को घेरे खड़े थे और उसकी मजाक बना रहे थे.बच्चों के बीच खड़ा बालक शरीर से सुन्दर एवं बलवान था लेकिन......?! सहमा सहमा सा वह खड़ा मन ही मन सोंच रहा था -"क्या यह अपने हैँ?"


वह बोल पड़ा -

"आपलोग हमसे क्यों जलते हो?मैं तो आप लोगों का भाई हूँ." सब बच्चे हंसने लगे,उनमेँ से एक बोला -"भाई है तो क्या?बाप तुझे होशियार एवं बुद्धिमान मानता है अब दिखा अपनी होशियारी और बुद्धिमानी.."

"अपनों के बीच कैसी होशियारी एवं बुद्धिमानी?अपनों के बीच तो प्रेम सौहार्द से रहना चाहिए."

"इल्तु!तेरी गलती इतनी है कि बाप हम भाइयों मेँ से तुझे सबसे ज्यादा चाहता है."


इल्तुतमिश खामोश ही रहा ,उसने मुस्कुराने की कोशिस की.

"इल्तु,तुझे बाप इतना क्यों चाहता है?"

"इसका जबाब खुद अपने से पूछो."


"हाssssssहाsssss!"फिर सब हँस पड़े.

"पागल है,क्या कुछ अपने से भी पूछा जाता है?"

" क्या आप मेँ से कोई नहीं जानता 'अपने से पूछने'का मतलब क्या है?"

"तुम जैसे पागल ही जानते होंगे."



इल्तु का पूरा नाम था -शम्सुद्दीन इल्तुतमिश.जो इल्बारी तुर्क वंश से सम्बंध रखता था.पिता का नाम था-इलाम खाँ,जो एक कबीले का प्रधान था.जब भी पंचायत होती , इल्तु अपने पिता के साथ चबूतरे पर बैठता था.कबीले की पंचायत भी इल्तु की होशियारी एवं बुद्धिमानी पर विश्वास करती थी.


"कुदरत भी किसी किसी को देती है छप्पर फाड़ कर देती है ."इल्तु का एक भाई बोला तो दूसरा भाई बोला -"इल्तु भाग्यशाली है.शरीर तो सुन्दर पाया ही दिमाग भी सुन्दर पाया और लोगों की मोहब्बत भी."


तीसरा बोला -"मेरे दिमाग मेँ एक हरकत सूझ रही है.इल्तु जिन्दगी भर गुलामी करेगा और हमारे आंखोँ की किरकरी भी नहीं बनेगा."

तब पहला भाई बोला -"हाँ,दिमाग में आया .इल्तु को क्यो न गुलामों के बाजार मेँ ले जा कर बेंच देँ."

इल्तु के सभी भाई इल्तु को पकड़ कर पशुशाला मेँ ले आये.


"आपसब क्या चाहते हो ?हम आपका क्या बिगाड़ते हैँ?"


"हम सब तुम्हें देख कर जलते हैं."


"हाजमा भी नहीं होता."


"हाsssहाssssहाssssss"सब ठहाके लगा हँस पड़े.


"अब हम सब तुझे गुलामों के बाजार मेँ बेँच देंगे."


"तू यदि कुछ भी हम लोगों के खिलाफ बोला तो खैर नहीं."


"आप सब मेरे भाई हो.हम नहीं चाहते आप सब परेशान रहे लेकिन मैं ऐसा क्या करता हूँ जिससे आप सबको परेशानी होती है?"


"परेशानी?!" फिर सबके सब ठहाके लगाने लगे.


"हम सब नहीं चाहते कि तू हम लोगों व बाप के साथ रहे."

इल्तु के भाईयों ने उसे एक व्यापारी के हाथ बेंच दिया.इसके बाद वह पुन: दो बार बेँचा गया . इल्तु के साहस नेतृत्व एवं संस्कारों से लोग काफी प्रभावित होते गये . बालक होते हुए भी वह बालकों के स्वागत से काफी ऊपर उठ कर बड़ों एवं बुजुर्गों की शोभा बनने लगा था.इसका मतलब यह नहीं कि वह अपनी उम्र के बालकों के बीच नहीं जाता था या नहीं रहता था.गुलाम होते हुए भी वह लोगों को आकर्षित करता रहता
था.


इल्तु एक चट्टान पर बैठा चट्टानों को काटती औरतों व लड़कियों को देख रहा था.


"इल्तु,क्यों गुमसुम से बैठे हो यहाँ?"-एक बालिका आकर बोली.


"तू फिर आ गयी यहाँ .मालिक से तेरी शिकायत करुंगा .कोई काम नहीं बकबास करने चली आती है ."


"इल्तु,तू वास्तव मेँ उल्टा है.हमेँ क्या गर्ज पड़ी तुझसे बकबास करने की और फिर तू खास है मालिक का.तू हमेँ अच्छा लगता है तो आ जाती हूँ."


"जा,अच्छा यहाँ से.जा पहाड़ काट जा कर."

घोड़े पर सवार हो एक युवक आ पहुँचा.

गजनी और हिरात के बीच गोर पहाड़ी क्षेत्र .जहाँ के सभी निवासी बौद्ध मतावलम्वी थे .जिसे जीतकर महमूद गजनवी ने जहाँ इस्लाम मजहब को बढ़ावा दिया .सन 1030ई0को महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद गजनवी राज्य कमजोर पड़ने लगा . अब गोर क्षेत्र मेँ तुर्कों का शंसबनी वंश सक्रिय हो चुका था,जो पूर्वी ईरान से आकर गोर क्षेत्र मेँ बस गये थे .जिनमेँ से ही एक योद्धा शिहाबुद्दीन उर्फ मुईजुद्दीन मुहम्मद
ने सन 1173-74ई0मेँ गजनी पर विजय पायी .उस वक्त गोर प्रदेश का शासक था गियासुद्दीन गोर जो शिहाबुद्दीन उर्फ मुईजुद्दीन मुहम्मद का भाई था.शिहाबुद्दीन उर्फ मुईजुद्दीन मुहम्मद ही आगे चल कर मुहम्मद गोरी के नाम से प्रसिद्ध हुआ .उन दिनों दिल्ली और अजमेर का शासक चौहान वंशी पृथ्वीराज तृतीय उर्फ रायपिथौरा था . कन्नौज के गहड़वार शासक जयचंद्र की पुत्री संयोगिता से बलपूर्वक विवाह करके
उसने उससे घोर शत्रुता मोल ले ली थी .


इल्तु मन ही मन सोंच रहा था -


"भविष्य मुसलमानों का है.हिन्दू राज्य तो आपस मेँ ही लड़ कर अपनी शक्ति को कमजोर किए जा रहे हैँ.उनकी उन्नति के सभी स्रोत सूख चुके हैँ."


बालिका इल्तु से कुछ कह रही थी लेकिन इल्तु .....?!


"हिन्दू तो आपसी द्वेष भावना मेँ अपनी शक्तियां बर्बाद किये जा रहे हैँ.मैं इल्तुतमिश हिन्दूओं की कमजोरियों की नींव पर अपनी या अपनी अगली पीढ़ी के लिए सल्तनत खड़ी कर सकता हूँ और......"

"कहां खो जाते हो,इल्तु?देखो कौन आया है?"


इल्तुतमिश सोंच रहा था "बहुत सोंच चुका हूँ अब चलना है.,रुकना नहीँ.हिन्दुस्तान सो रहा है,मैं क्या इसका फायदा नहीं उठा सकता?"

"इल्तु!"

"चलते हैं." -फिर इल्तु उठ बैठा.


उठते उठते मन ही मन "सुना है गोर मेँ आपसी झगड़ों के कारण कुछ हिन्दुस्तानी भाग कर आये हैँ,जिन्होने इस्लाम भी कबूल कर लिया है.हिन्दुस्तान की कमजोरियों को जानने के लिए क्या उनका फायदा नहीं उठाया जा सकता ? "


सन 2002ई0 की 01 सितम्बर पाक अधिकृत कश्मीर मेँ एक आतंकी प्रशिक्षण शिविर मेँ एक आतंकवादी सोंच रहा था -"इल्तु के कथन आज 800वर्ष के बाद भी सटीक हैँ."

Friday, 28 October 2011

31 अक्टूबर : पटेल जयंती

व्रिटिश शासन से मुक्ति को अनेक का योगदान चिरस्मरणीय है.जिनमें एक थे सरदार वल्लभ भाई पटेल.सन 1946 तक जिन नेताओं का आचरण प्रसंशनीय था वहीं उनमेँ से कुछ का चरित्र संदिग्ध हो गया जो कि लार्ड माउण्टबेटन व लेडी बेटन का चक्कर लगाने लगे थे.जिनमेँ पटेल व नेहरु भी शामिल हैं.प्रधानमंत्री बनने की लालसा मेँ ये दोनों नेता देश के विभाजन का समर्थन कर बैठे व गांधी को अलग थलग कर दिया जिनके
सहारे ये यहां तक पहुंचे थे.


सरस्वती कुमार,दादुपुर वाराणसी के अनुसार लार्ड क्लायू बंगाल का शासक बनना चाहता था जिसके लिये वहां के नवाब सिराजुदौला के सेनापति मीरजाफर को नवाब बनने का लालच दिया और प्लासी के मैदान मेँ मीरजाफर के सहयोग से अंग्रेज बंगाल का शासक बन गये उसी प्रकार लार्ड माउण्टबेटन ने नेहरु और पटेल से अलग अलग मिलकर दोनों को प्रधानमंत्री बनाने का लालच देकर गांधी जी से लड़ा दिया.इन दोनों ने
विभाजन को अपने लिए वरदान समझ कर सहमति दे दी.गांधी जी विभाजन राष्ट्र के लिए आत्मघाती समझते थे इसलिए राष्ट्रहित मेँ जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रक्खा लेकिन खुदगुर्ज नेहरु और पटेल गांधी के विरुद्ध अटल मुद्रा मेँ खड़े हो गये.

मौ.अबुल कलाम आजाद अपनी पुस्तक 'इंडिया विन्स फ्रीडम'मेँ लिखते हैं कि मेरे सहायक तथा उम्मीद केवल गांधी जी रह गये थे.इस समय गांधी जी पटना मेँ रहे थे.वह 31 मार्च 1947 को दिल्ली मेँ आये.मैँ तुरन्त मिलने गया.उनका पहला वाक्य था कि भारत विभाजन एक धमकी बन गया है.ऐसा लगता है कि बल्लभ भाई तथा जवाहर लाल ने हथियार डाल दिये हैँ.
पृष्ठ 228पर आजाद लिखते हैं कि नेहरु और सरदार पटेल ने विभाजन स्वीकार करके गांधी जी को मर्माहत कर दिया.विभाजन की ट्रैजिडी से देश को बचाने के लिए गांधी जी ने जिन्ना को भारत का प्रधानमंत्री पद देने का प्रस्ताव रखा तब दोनों गांधी से बगावत करने लगे और प्रचार करना शुरु कर दिया कि गांधी मुसलमानों के पक्षधर हो गये हैँ.इन दोनों ने माउण्टबेटन को विश्वास दिलाया था कि विभाजन के बाद
किसी भी प्रकार का दंगा फसाद नहीँ होगा लेकिन जब लाहौर मेँ हिन्दू और सिक्ख और पंजाब मेँ मुसलमान गाजर मूली की भांति काटे जाने लगे तब गांधी ने हिंसा रोकने के लिये आमरण अनशनकर दिया.अनशन से पंजाब दिल्ली और लाहौर मेँ भी शान्ति की बहाली हो गयी तब 20जनवरी 1948को हिन्दू आतंकवादियों ने गांधी को बम का निशाना बनाया.गांधी जी बाल बाल बच गये.लेकिन उन्हीं लोगों ने 30जनवरी1948को सायं पाच बज कर
सत्रह मिनट पर गांधी की हत्या कर दी.मौ.अबुल कलाम आजाद ने इसके लिए नेहरु व पटेल को ही दोषी माना.


लैरी कालिन्स दामिनिक लैपियर अपनी पुस्तक 'आधी रात को आजादी'मेँ लिखते हैं कि नेहरु और पटेल तथा भारत की प्रतिक्रियावादी शक्तियां गांधी के विरूध अंदर ही अंदर कुछ और सोचने लगे थे....20जनवरी1948को जब गांधी पर बम फेंक मारने की कोशिस की गयी तो पकड़े गये व्यक्ति ने सही सही बयान मेँ सब कुछ बता दिया था.नाथू राम एवं गोपाल गोडसे,करकरे,बगड़े,परचुरे आप्टे,आदि का नाम व पता बयान कर दिया
था.54पृष्ठों के बयान पर ज्यों ही कार्यवाही जोर पकड़ने वाली थी कि पूरी फाईल आई.जी.द्वारा मंगा ली गयी.आई जी डी जे संजीव उस समय दिल्ली पुलिसचीफ थे उन्होने फोन करके मेहरा को आश्चर्य मेँ डाल दिया था कि मदन लाल के मामले की चिन्ता आप न करें यह मामला मैं देख लूंगा.लैरी कालिन्स दामिनिक लैपियर के ही अनुसार असल मेँ अपराधियों के तार शासन प्रशासन से जुड़ चुके थे.(पृष्ठ 309)

कल जब एक स्थान से पटेल जयन्ती कार्यक्रम मेँ शामिल होने के लिए जब मेरे पास निमंत्रण पत्र आया तो मैं उपरोक्त विचारों पर चिन्तन करने लगा.मेरा मन इस मामले मेँ पटेल व नेहरु के प्रति आक्रोशित रहता है.जब मैं मीरजाफर जैसो गद्दारों को सम्मान नहीं दे सकता तो पटेल व नेहरु को क्यों?और उन जैसे व काले अंग्रेजो को क्योँ?लार्ड माउण्टबेटन व लेडी बेटन व अब सोनिया टीम का चक्कर काटने वाले
उन नेताओं को सम्मान दिया जाए जो देश की असलियत या हिन्दूओं या सच्चे सेक्यूलरवादियों का दर्द नहीं समझना चाहते व देश की सम्पत्ति विदेश ले जाने वालों का समर्थन करते है.मेरी इच्छा नहीं होती कि मै पटेल व नेहरु के सम्मान मेँ आयोजित होने वाले किसी कार्यक्रम मेँ शामिल होऊँ...?


मैं जिस कालेज में टीचिँग करता हूँ उस कालेज में सिर्फ गांधी व नेहरु की ही जयन्ती बनायी जाती है.अनेक को यह आपत्ति है कि अन्य महापुरुषों की जयंती क्यों नहीँ ?


पटेल व सुभाष सम्बंध!


किसी विद्वान के अनुसार सरदार पटेल नेता जी सुभाष चंद्र बोस से इसलिए चिढ़ते थे क्योंकि उनके भाई विठ्ठलभाई ने अपनी सम्पति सुभाष को दे दी थी.

Saturday, 22 October 2011

वोट देने से पहले के सवाल !

मानवता हिताय सेवा समिति उप्र के अध्यक्ष श्यामाचरण वर्मा ने मतदाता जाग्रति के दौरान ददियूरी (बण्डा)शाहजहांपुर उप्र मेँ स्थित सुनासिर तीर्थ पर एक विचार गोष्ठी मेँ बताया कि प्रजातंत्र मेँ हमारा वोट एक हथियार से कम नहीं है.उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी उमेश सिन्हा के अनुसार युवा अपनी शक्ति को पहचान कर मतदाता जागरुकता अभियान मेँ अपनी भागीदारी सुनिश्चित
करेँ.जनता जागे तो देश जागे.किसी ने कहा है कि अंग्रेजों आदि विदेशी आक्रमणकारियों से शायद इस देश का इतना नुकसान नहीं हुआ जितना कि हमारे अपनों से या नेताओं से.अखण्ड भारत को खण्ड खण्ड करने वाले विदेशी नहीं थे..?विदेशियों ने यहां आना शुरु किया इससे पूर्व ही अखण्ड भारत टूट टूट कर विखर चुका था.आज भी काला धन व सामाजिक राजनैतिक भ्रष्टाचार की जड़ मेँ कौन बैठा है?


हम सरकारी गैरसरकारी व्यवस्थाओं की आलोचना तो करते हैं लेकिन प्रजातंत्र मेँ हम अर्थात प्रजा ही जिम्मेदार है.कोषाध्यक्ष सुजाता देवी शास्त्री ने बताया कि हम सामूहिक जीवन हेतु अपने कर्तव्यों को भूल चुके हैँ.जाति,मजहब.आदि से प्रभावित होकर हम जिन नेताओं को चुनते आये हैं वही हमारे गांव,नगर,जनपद,प्रदेश व देश के कुप्रबंधन व भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार रहे हैं.


समिति के संस्थापक अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु' ने बताया कि दरअसल हम न प्रकृति के है न ब्रह्म के हैँ वरन निजभौतिक स्वार्थ के लिए जीवन जीने के बीच अपने नेताओं को चुनते आये हैं.यदि आप मेँ थोड़ा सभी ईमान,धर्म,आध्यात्मिकता,इंसानित,आदि बची है तो वोट देने से पहले नेताओं से पूछो-


(1)अन्ना जिस गांव मेँ पैदा होते है उस गांव शराब,बीड़ी,सिगरेट,तम्बाकू,आदि बिकना बंद हो जाती है लेकिन ऐ नेताओं तुम्हारे गांव या शहर मेँ......?!

(2)अन्ना जिस गांव में पैदा होते हैं उस गांव मेँ गरीबी व भुखमरी खत्म हो जाती है लेकिन ऐ नेताओं तुम्हारे गांव या शहर मेँ....?!

(3)अन्ना के गांव के सभी बच्चे स्कूल जाते हैं लेकिन ऐ नेताओं तुम्हारे गांव या शहर के बच्चे....??


(4)अन्ना के गांव निवासी अपने गांव मेँ अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं लेकिन ऐ नेताओं तुम्हारे गांव या शहर मेँ.....?!

(5)अन्ना के गांव मेँ पर्यावरण प्रदूषण,गंदगी,खाद्यमिलावट,आदि की समस्याएं नजर नहीं आतीं लेकिन ऐ नेताओं ....?!


(6)अन्ना के गांव मेँ क्षेत्र की समस्याओं के हल के लिए सभी जन व नेता एक साथ नजर आते हैं लेकिन ऐ नेताओं तुम्हारे गांव या शहर मेँ.......?!

(7)अन्ना के गांव मेँ शराबी शराब पीना छोंड़ देते है या छुड़वादी जाती है लेकिन ऐ नेताओं तुम्हारे गांव व शहर मेँ......?!


(8)अन्ना के गांव मेँ अनाज, दूध,सब्जी,आदि सम्बंधी समस्याओं से पब्लिक को जूझना नहीं पड़ता लेकिन ऐ नेताओं ......?!


इस अवसर पर मुख्य अतिथि रोशन लाल गंगवार ने वताया कि इन नेताओं की असलियत समझ कर अपने वोट का इस्तेमाल जाति,मजहब,निजस्वाथं,आदि की भावना से ऊपर उठ कर करें.प्रजातंत्र मेँ प्रजा मालिक होती है ये नेता या जन प्रतिनिधि हमारे मालिक या राजा नहीं है वरन जनसेवक है.सत्ता परिवर्तन से नहीं व्यवस्था परिवर्तन से देश का विकास सम्भव है.अहिंसा व सत्य पर चल हिन्दू मुस्लिम एकता के बल पर देश
अखण्ड भारत,दक्षेस व विश्व सरकार का भी सपना देखा जा सकता है व उसके लिए योजना बनायी जा सकती है.

सचिव,
मानवता हिताय सेवा समिति , उ प्र