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Sunday, 11 September 2011

विकीलीक्स(wikileaks):विपक्षी बयान पर पागल जूलियन असांज?!

किसी की अभिव्यक्ति को अपने पक्ष या विपक्ष मेँ लेना खतरनाक है.वैचारिक जगत दो ही पक्ष हैं- सत्य व असत्य.

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: "go@blogger.com" <go@blogger.com>
Date: रविवार, 11 सितंबर, 2011 11:48:02 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: विकीलीक्स(wikileaks):विपक्षी बयान पर पागल जूलियन असांज?!

विकीलीक्स कब किसकी सच्चाई उगल दे,इसका कुछ पता नहीँ.नेता,मंत्री,शासक, प्रशासक,आदि सब इसके द्वारा अपनी सच्चाई जानने के बाद बौखला जाते है.सच्चाई को पचा पाने की दम बैसे भी कितनों को होती है?विकीलिक्स की ओर से आए दिन किए जा रहे खुलासा पर उत्तर प्रदेश की मायावती ने जमकर पलटवार किया है.मायावती ने जमकर पलटवार किया है.मायावती ने विकीलिक्स के तमाम खुलासों को बेबुनियाद और तथ्यहीन करार देते हुए इसके मालिक जूलियन असांज को पागल करार दिया.मायावती का कहना है कि विकीलीक्स का मालिक पागल हो गया है या फिर वह विरोधी पार्टियों के हाथों खेलकर उनकी सरकार के खिलाफ साजिश रच रहा है.


फिल्मों मेँ एक सच्चाई होती है. नेता, अफसर, आदि सबके सब गुण्डों,माफियाओं,आदि के समर्थन मेँ खड़े पाये जाते है.सबके सब धर्म,कानून,आदि के विरोध मेँ खड़े मेँ पाये जाते हैँ .इतना नैतिक पतन हो गया है कि सच्चाई पर चलने वाले को पागल,सनकी,आदि कह कर समाज मेँ उसे उपेक्षित व अन्दर अन्दर उसके खिलाफ साजिशें रची जाती हैँ.सच्चाई के लिए जीने वाले को पहला विरोध अपने परिवार से ही झेलना पड़ता है.धन्य!शासन प्रशासन!अन्नाजय!

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Saturday, 10 September 2011

बरेली मण्डल मेँ सकलैन मियां के घायल होने के बाद सड़कों पर आक्रोश!

अन्ना आन्दोलन के बाद अब फिर बरेली मण्डल के कस्बोँ शहरों व जनपदों मेँ सड़कों पर भीड़ निकल पड़ी है.अब सड़क पर आक्रोश दिखाने का कारण उसके गुरु व समाजसेवी सकलैन मियां का घायल होना है.शुक्रवार की शाम उर्स मेँ बसपा विधायक की कार से बदायूं जिले में बरेली शहर प्रेमनगर स्थित शराफत मियां की दरगाह के सज्जादानशीं हजरत सकलैन मियां घायल हो गये थे.कुछ मुरीद धरने पर भी बैठ चुके हैँ.विदेशी मुरीद भी हेलीकाप्टर से आना प्रारम्भ हो चुके हैँ.इधर बदायूं मेँ लाखों मुरीदों के दबाव के चलते बसपा विधायक मुस्लिम खां समेत चार लोगों के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज हो गया है.ककराला व अलापुर मेँ अब भी हजारों मुरीदों ने धरना व प्रदर्शन कर आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग की.इधर तथाकथित अपराधी बसपा विधायक मुस्लिम खां के चेहतोँ का कहना है कि सकलैन मियां पर क्या जानबूझ कर गाड़ी चढ़ायी गयी थी ?अन्जाने हुई घटना पर माफ करना क्या धर्म नहीं है?मो. साब ने तो अपने पर कूड़े फेंकने वाली औरत पर दया ही दिखायी थी..?इधर गैरमुस्लिम कट्टरपंथियों मेँ दूसरी ही प्रतिक्रिया है.मायावती सरकार के पक्षी या विपक्षी अलग अलग बयान दे रहे है.

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Friday, 9 September 2011

9/11 बरसी और आतंकवाद!

इस समय मीडिया मेँ 9/11 बरसी के चर्चे हैं .आतंकवाद पर समाचार व लेख सामने आरहेहैं.आतंकवाद खिलाफ लड़ाई मेँ दृढ़इच्छा कमी है.देश व देश के बाहर कोई भी शासक आतंकवाद को खत्म करने को प्रथम व सर्वोच्च वरीयता देना नहीं चाहता.आतंकवादी सरगना लादेन की मृत्यु से पूर्व के तीस मिनट की अमेरीकी शैली पर कम से कम भारत को तो सीख लेनी ही चाहिए हालांकि अभी अमेरीका की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में लोगो की निगाहेँ संदिग्ध है.देशनागरिकों के सम्मान व सुरक्षा को हरहालत मेँ संवैधानिक कोशिशें होती रहनी चाहिए.आफसोस की बात हैं अभी जल्द दिल्ली हाईकोर्ट के सामने हुए बम विस्फोट में पीड़ित परिजनों को कांग्रेस मंत्रियों,नेताओं के विरोध में आखिर नारेबाजी क्यों करनी पड़ी ?इन नेताओं को अपनी कार्यशैली व सोंच का अध्ययन कर बदलाव की आवश्यकता है.देश के चलाने वाले कायर नेताओं की संख्या बहुतायत मेँ हैं . जब क्षत्रियों का ही क्षत्रियत्व सोया हुआ है तो अन्य नागरिकों व नेताओं का क्या कहेँ?जो क्षत्रियत्व (जातिभेद से ऊपर उठकर परोपकार व समाज देश,आदि की निष्पक्ष सेवा भावना) आज समाज,देश के हित मेँ उठता भी है,उसे अलोकतान्त्रिक ढंग से कुचल दे.

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Monday, 5 September 2011

नक्सली कहानी:लालगढ़ का लाल

 नक्सली कहानी:लालगढ़ का लाल
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लालगढ़ के एक कालेज मेँ सैनिकों ने कल ही छात्रों पर लाठियां चलायीं थीँ जो कि सैनिकों से कालेज खाली करने की मांग कर रही थीँ.
कालीदेवी के सामने एक बालक आदिवासी वेशभूषा मेँ मेडिटेशन पर बैठा था.खून से लथपथ चार छात्राएं मंदिर मेँ आकर गिर पड़ीँ.वह बालक उठ बैठा.उसके आंखों मेँ आक्रोश चमक रहा था.अपना धनुष तरकश उठा कर वह मंदिर से बाहर आ गया.सैनिक आदिवासियों को खदेड़ रहे थे.एक विछिप्त वृद्धा बोली-"बेटा!यह नेता पुलिस मिलेट्री कोई हमारी नहीं है और फिर कब जीतेंगे हम उनकी शक्ति के सामने?"
"दादा की याद है?कह कर क्या गये थे?हम शासन प्रशासन के सामने जीत नहीं सकते तो क्या,हम वहाँ जा कर एकता का प्रदर्शन तो कर सकते हैँ."
फिर वह बालक अपना धनुष तरकश संभालते हुए आगे बढ़ गया.
इधर मैं बीसलपुर से शाहजहांपुर ट्रेन से जा रहा था.निगोही स्टेशन पर कुछ मुस्लिम युवक एक सिपाही के साथ ट्रेन में आ चढ़े.वे गांधी की आलोचना कर रहे थे.मुझे बिना बोले रहा न गया.मैं बोल दिया-"....चाहेँ व्यक्ति किसी मत या पन्थ का हो यदि वह वास्तव मेँ धार्मिक व आध्यात्मिक है तो वह करुणा ज्ञान अन्वेषण मानवकल्याण अहंकारशून्यता आदि से जुड़ जाता है.मोहम्मद साब को आप मानते हैं मैं भी
मानता हूँ.जब वह उन पर कूड़ा डालने वाली औरत बीमार पड़ जाती है तो वे उसका हालचाल लेने पहुंच जाते हैं.यदि मोहम्मद साब की जगह हम होते तो ....?!जरा अपने से तुलना कीजिए,गांधी को छोंड़ों आप लोग अभी मोहम्मद साब तक को नहीं समझ पाये हैं.दरासल हम आप सब इन महापुरुषों के हैं ही नहीँ. आप सब अभी जिस स्तर पर जा कर बात कर रहे थे वह स्तर व्यक्तिगत स्वार्थों मतभेदों कूपमंडूकताओं उन्माद तनाव आदि से
भरा होता न कि दया करुणा समर्पण त्याग से.गलत तो गलत है चाहेँ ...."सिपाही बोला-"वरुण गांधी को ही लो मैं नहीं कहता कि वरुण गांधी भड़काऊ भाषण के कारण दोषी नहीं हैँ?इसके लिए पहले से ही उपस्थित परिस्थितियाँ या कारण भी दोषी हैः उसकी बात शासन प्रशासन क्यों नहीं करता?कारणों को सजा क्यों नहीं?सिर्फ वरुण गांधी दोषी क्यों?" मैं बोला-"लालगढ़ मेँ जो हो रहा है क्या हो रहा है?वैसा ही कि कोई
सरकारी महकमों शासन प्रशासन आदि की मनमानी अन्याय शोषण से परेशान होकर झूंझला जाये और ऊपर से शासन प्रशासन भी उस पर हावी हो जाये न कि उसके लिए न्याय व सहानुभूति का वातावरण बनायें और वास्तविक दोषियों को सजा देँ."

इधर-उस धनुर्धारी बालक के चेहरे पर अब भी आक्रोश स्पष्ट था.वह कह रहा था कि मेरे सरजी कहते हैं कि यदि सिर्फ उपदेश व भाषण ही सिर्फ महत्वपूर्ण होते तो न जाने कब की यह धरती स्वर्ग बन चुकी होती?यह धरती कर्मभूमि है कर्मभूमि.शब्दों के जाल...."जंगल के बीच कुटिया मेँ उस बालक व अधेड़ सन्यासी के अतिरिक्त कुर्ताधारी एक नेता भी उपस्थित था.
अधेड़ सन्यासी बोला-"सेक्यूलर फोर्स के आन्दोलन में आपके सर जी भी तो शामिल थे?क्या मिला उस आन्दोलन से?""तो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने या यहाँ कुटिया में जाप करते रहने से क्या होगा?मैं भी जानता हूँ कि अन्तिम निदान धर्म व अध्यात्म ही है.ऋषियों मुनियों नबियों के दर्शन मेँ हर समस्या का निदान है,यह मैं भी जानता हूँ.""बेटा!"-युवा नेता बोला."हाँ." "धैर्य से काम लो . दो की लड़ाई में तीसरा लाभ
उठाता रहा है.हम आदिवासियों के आन्दोलन का नक्सलीकरण हो रहा है.""हमेँ समर्थन चाहिए ही .अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता .हमें भी समूह चाहिए .नेताओं अफसरों कर्मचारियों से विश्वास उठ ही चुका है .कुप्रबंधन,भ्रष्टाचार,व्यक्तिगत स्वार्थ,भौतिक भोगवाद,सांस्कृतिक आक्रमण,तुष्टिकरण नीति,आदि,के बीच हम किससे उम्मीद रखेँ?" "बेटा,तुम जिस रास्ते पर हो वह रास्ता देश को गृहयुद्ध की ओर ले जाने
वाला है." "हूँ!और नेता अफसर कर्मचारी विधायक एमपी आदि सब जो कर रहे हैँ वह देश को जिस रास्ते पर ले...... ."बेटा,समझता हूँ तुम्हारा दर्द!तुम तो होशियार हो.भावावेश में आ कर कोई कदम नहीं उठाना चाहिए." बालक सिर उठा श्रीकृष्ण की तश्वीर को देख कर गहरी गहरी साँस लेने लगा .
"होशियार तो आप नेतागण हो? जोचोर,अपराधियों,बदमाशों, साम्प्रदायिकों,जातिवादियों, पूंजीपतियों,माफियाओं,आदि के समर्थन में खड़े पाये जाते हैँ?...और आप लोगों का सेक्यूलरवाद?हिन्दुओं के पक्ष में जा कोई जो करे वह साम्प्रदायिक है और जो गैरहिन्दुओं के पक्ष मेँ जा कर हो क्यों न भविष्य मेँ वह देश के लिए घातक हो,साम्प्रदायिक नहीं है?विदेशियों को देश में आश्रय देने वालों पर अंगुली
उठाते हो और जो देश के अन्दर देश व संवैधानिक धरोहरें हैं,उनके खिलाफ खड़े है जो उनको वोटों के स्वार्थ में आगे बढ़ने का अवसर दे रहे हो?मस्जिदों,आदि के नीचे दबे पुरातात्विक सच को आप नेताओं को सच कहने की हिम्मत नहीं है?नेता जी सुभाष चन्द्र वोस व शास्त्री की मृत्यु सम्बन्धी,नेहरु बेटन सम्बन्धों सम्बन्धी,अमेरीका मेँ ओशो को थेलियम देने सम्बंधी,आदि पर आप नेता कोई प्रश्न उठाने की
हिम्मत नहीं रखते?आप नेताओं ने क्या कभी सोंचा कि भावी इतिहास में क्या हमारी गिनती देशभक्तों व नायकों मेँ होगी? "पुन:-"जय श्रीकृष्ण!धर्म के पथ पर कोई अपना नहीं होता.मैं आप लोगों की नहीं सुनने वाला. मेरे पास भी बुद्धि व विवेक है.मुझे आप लोगों से नहीं,महापुरुषों व ग्रंथों से सीख लेनी है.मेरे सरजी भी कहते थे कि समाज क्या चाहता है- यह मत देखो?यह देखो महापुरुषों व ग्रंथों मेँ क्या
है?जय कुरुआन जय कुरुशान! "कुटिया मेँ एक ओर एक कलैंडर में सूर्य,दूज चन्द्रमा व तारा का चित्र बना था और लिखा था-ओ3म आमीन!जिस पर निगाह डालते हुए बालक कुटिया से बाहर आ गया.एक ओर से कुछ सशस्त्र युवतियों के बीच से एक बालिका दौड़ती हुई बालक के पास आयी-"लाल महतो,तेरे वो विचार क्या मर गये?तू तो बड़ा हो कर अफसर बनना चाहता था लेकिन बागी बन बैठा.""बर्दाश्त करते करते बहुत हो गया.बचपन
सेहीघर,स्कूल,फिर समाज मेँ लोगों कीमनमानी,कुप्रबंधन,भ्रष्टाचार,आदि को सहता रहा लेकिन अब नहीं.रोज मर मर कर जीने से अच्छा है,एक बार मर ना.."
@अशोक कुमार वर्मा'बिंदु'




Friday, 2 September 2011

नक्सली कहानी:असन्तोष की आंधी!

हरिकृष्ण कायस्थ केशव कन्नौजिया के साथ एक पेँड़ पर बैठा मचान पर बातचीत कर रहा.ये जहां थे वह जंगली इलाका था.कुछ शस्त्रधारी युवक युवतियां इधर उधर गस्त कर रहे थे.

एक झोपड़ी के अन्दर एक किशोरी कुछ युवतियों के साथ बैठी थी.जिससे एक युवती बोली-"....तो तुम ही फरजाना हो.वर्मा से लेकर बांग्ला देश तक और बांग्ला देश से यहां तक तुम्हारे साथ जो जो हुआ उससे ज्ञात हो गया होगा कि ये समाज कैसा है?हम लोगों की मानों तो हम नक्सलियों के साथ आ जाओ."

"समाज चाहे कितना भी बुरा हो जाए लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि समाज मेँ अच्छे लोग रह ही नहीं गये."

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From: akvashokbindu@yahoo.in
To: go@blooger.com
Sent: Thu, 01 Sep 2011 19:56 PDT
Subject: नक्सली कहानी:असन्तोष की आंधी!

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी मीडिया के सामने बोल रहे थे कि आतंकवादियों व नक्सलियों को अन्ना आन्दोलन से सीख लेनी चाहिए.अहिंसा से बढ़कर कोई अन्य शस्त्र नहीं है.


जंगल के बीच कुछ झोपड़ियां पड़ी हुई थीँ.जिनमेँ से एक झोपड़ी मेँ कुछ सशस्त्रधारी युवक युवतियां लेपटाप पर समाचार देख रहे थे.जहां केशव कन्नौजिया भी उपस्थित था.


इधर मैं मीरानपुर कटरा मेँ कृष्णकान्त के कमरे पर बैठा भावी अहिंसक नक्सली आन्दोलन की संभावनाओं पर बातचीत कर रहा था.इन दिनों अन्ना आन्दोलन महानगरों व कस्बों से निकल कर गांवों मेँ भी पहुँच चुका था.मैं लगभग पन्द्रह वर्ष से अन्ना हजारे नाम से परिचित ही नहीं वरन प्रभावित था.

फरबरी सन 2011ई से टीम अन्ना की नई दिल्ली मेँ सक्रियता ने हमें उत्साहित कर दिया.मेरे अन्दर बैठी भावी क्रान्ति की रणनीति,जिन पर मैने स्वलिखित उपन्यासों मेँ भी जिक्र किया है;टीम अन्ना के माध्यम से पूर्ण होने की उम्मीद करने लगा था.मैं भी एक अच्छे हेतु के लिए ही दुनिया मेँ आया था.बचपन से ही मैं आम आदमी की भीड़ से अलग थलग हो महापुरुषों, बुद्दिजीवियोँ,आदि की पंक्ति में खड़े होनेको
लालायित होने लगा था लेकिन अपने को इसके लिए तैयार न कर सका.मेरी प्राईमरी एजुकेशन एक सन्त(बीसलपुर मेँ बड़े स्थल के सामने सड़क पर कुमार फर्नीचर के सामने गली मेँ मन्दिर के समीप) के द्वारा
व श्री हरिपाल सिंह,ठाकुर पूरनलाल गंगवार व टीकाराम गंगवार के द्वारा प्रारम्भ हुई.मेरे साथ सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन बस अपनी अन्तरात्मा की आवाज के आधार पर चलने के लिए संकल्प का अभाव था.अब अन्ना आन्दोलन हमेँ उद्वेलित कर रहा था.आखिर व्यवस्थाओं व हालातों से असन्तुष्ट व्यक्ति आन्दोलनों से प्रभावित क्यों न हो?मेरे अन्तर्जगत में खामोश पड़े आन्दोलन के एक हिस्से का अवतार था यह
अन्ना आन्दोलन,असन्तोष की आंधी.


मैं कृष्णकान्त के कमरे पर बैठा इण्टरनेट पर प्रकाशित स्वरचित नक्सली कहानी 'न शान्ति न क्रान्ति' को पढ़वा रहा था.

केशव कन्नौजिया असन्तोष को झेलते झेलते नक्सली हो चुका था.वह झोपड़ी के अन्दर बैठा जब मोदी के इस कथन को सुना कि आतंकवादियों व नक्सलियों को अन्ना आन्दोलन से सीख लेनी चाहिए.

"केशव....."-एक युवती बोली.


केशव कन्नौजिया के आंखे नम हो चुकी थीँ.वह उठ कर झोपड़ी से बाहर आ गया.


"बीजेपी नक्सलियों के विरोध मेँ रहेगी ही.मुसलमानों को आतंकवाद का विरोध करना चाहिए.मुसलमान वोट जब ज्यादा होगा तो वे चाहेँ जो करवा लेँ .मुस्लिम जेहादी पाक,कश्मीर, हिमाचल,यूपी,बिहार,बांग्लादेश,आदि को मिला कर मुगलस्तान का सपना देखते है.यदि अपनी इस ऊर्जा को अखण्ड भारत व सार्क संघ की संभावनाओं की ओर मोड़ दिया जाए तो ...."

"अरमान!तुम तो 'सर जी' की भाषा बोलने लगे हो.देखो केशव आ रहा है."


तब दोनों युवक खामोश हो गये.

* * *

आज 31 अगस्त सन 2011ई0!


सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को चेताया कि दस साल रुक जाईए लोग आपको सबक सिखायेंगे.तीन दिन पहले आप इसके गवाह रहे हैँ.आगे आन्दोलन व विरोध प्रदर्शन इससे भी बड़ा होगा.


गोधरा कांड के बाद गुजरात कांड में दोनों वर्ग के कट्टरपंथियों को मौत के घाट से उतारने वाला व असफल 'सेक्यूलर फोर्स'आन्दोलन को चलाने वालों की टीम मेँ शामिल विदुर राज गोडसे के बाद अब सफेद होने लगे थे.


"शायद हम लोग गलत रास्ते पर ही थे?सबसे बड़ा शस्त्र है- अहिंसा."

अरमान की उम्र लगभग सोलह वर्ष की तो रही ही होगी .गोधरा कांड की प्रतिक्रिया में हुए गुजरात कांड
के दौरान शिवानी के साथ रांची में आ जाना पड़ा . जहां वह अहिंसक नक्सली आन्दोलन के हितैषी आलोक वम्मा के सहयोग से रह कर पढ़ाई कर रहा था . हालांकि सन 2008 ई0 से लापता थे.एक न्यूज चैनल का तो कहना था कि नक्सलियों ने उसकी हत्या करवा दी थी.

रांची मेँ एक मीटिंग मेँ विश्वा(युवती),विदुरराज गोडसे,बिन्दुराज चाणक्य,बिन्दुसार कौटिल्य,चरित्र वम्मा,आदि सहित कुछ नक्सली नेता उपस्थित थे.ये नक्सली नेता नक्सली आन्दोलन को अहिंसक बनाने से सहमत नहीं थे.


विश्वा(युवती),विदुरराज गोडसे,बिन्दुराज चाणक्य,बिन्दुसार कौटिल्य, चरित्र वम्मा यह कहते हुए मीटिंग कक्ष से बाहर हो गये कि आप लोग अपने आन्दोलन को अहिंसक नहीं बना सकते तो कोई बात न लेकिन वक्त तुमको खामोश कर देगा.


एक नक्सली बोला-"हम आपके विचारों का सम्मान करते हैं लेकिन......"

"लेकिन - वेकिन क्या....अपने मन का अध्ययन करो,आप सब कुण्ठित होचुके हो.आप लोगों का मन आक्रोश से भर...."चरित्र वम्मा बोला.

एक नक्सली बोला-"सारी!".


दूसरा नक्सली बोला-"आप लोग नक्सली आन्दोलन के समर्थक हैं,अहिंसक ही सही.नहीं तो.....".


"आप लोग ईमानदारी से तर्क करें तो अन्ना के अहिंसक आन्दोलन के समर्थन में अवश्य हिंसा का त्याग कर देंगे."
-बिन्दुराज कौटिल्य बोला.

"आप लोगों ने क्या हिंसा नहीं की?"-एक नक्सली बोला.

"अब की बात करो."

इधर जंगल मेँ एक पेँड़ के मचान पर केशव कन्नौजिया हरिकृष्ण कायस्थ के साथ बैठा बातचीत कर रहा था.

"मुरी में कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ता देव पाल यादव व उसके तेरह वर्षीय पुत्र मर्म यादव के खिलाफ जनता की कार्यवाही तेज होती जा रही है."


जाहद के साथ बांग्ला देश से आयी फरजाना विभिन्न परिस्थितियों से गुजरने के बाद किशोरा वस्था मेँ वह मुरी शहर आ पहुंची.जहाँ वह मर्म यादव के बाबा राजेन्द्र यादव के सम्पर्क मेँ आ गयी थी.राजेन्द्र यादव उसे अपने मकान पर ले आये जहां वह घरेलू कामों को निपटाने लगी.
उसका पढाई मेँ ललक यादव सहयोग करने लगा जो कि मर्म यादव का भाई था.


मर्म यादव अपनी उम्र के लड़कों से दूने तन का था .जो लड़कियों के नियति ठीक नहीं रखता था.फरजाना प्रति भी नेक दिल न था.

Monday, 8 August 2011

नक्सली कथांश : कब खत्म नक्सल

हरिकृष्ण कायस्थ आगे बढ़ा लेकिन कोई भी सहयोग के साथ सच्चाई को रखने वाला नहीं मिला.कुछ मुस्लिम युवक ही सिर्फ सहयोग में थे.पूर्व विधायक यदुधन राज यादव ने सिर्फ इतना किया था कि कालेज कमेटी के सदस्यों से मिले थे लेकिन वह हरिकृष्ण कायस्थ व उनके सहयोगियों को सन्तुष्ट नहीं कर सके.ऐसा ही जिला कार्यालय पर शिक्षा अधिकारियों के द्वारा हुआ.सब के सब शिक्षा माफियाओं के समर्थन में खड़े.

केशव कन्नौजिया के पथ को क्या स्वीकार करना पड़ेगा?
क्या टेँढ़ी अंगुली से घी निकालना गलत है?इसके बिना चारा क्या?मेरे साथ यह अच्छाई है कि मैं मरने के लिए भी तैयार हूँ ऐसे में मैँ क्या नहीं कर सकता?ऐ श्वेतवसन अपराधियों में कितने मरने के लिए तैयार है?ऐसे में हम संघर्ष कर दुनिया को मैसैज तो दे ही सकते हैं.और फिर जब धर्मशास्त्र ही हिंसा से भरे हैं तो फिर मैं कुरुशान(गीता) के आधार पर क्यों नहीं आगे बढ़ सकता?गीता आज भी प्रासांगिक है. चन्द्रसेन क्या अपराधी था?यदि अपराधी था भी तो उसे अपराधी बनाने वालों पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया?फिर एक ओर जेल में ही हत्याएं?
आखिर नक्सलवाद क्यों न पनपे?आदिकाल से अब तक कब खत्म हुआ नक्सलवाद.....?

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नक्सली कहानी : हिन्दू तो स्वार्थी

अब लोगों को शिकायत है कि हरिकृष्ण कायस्थ तो मुस्लिम लड़कों को लिए घूमता रहता है.ग्रामीण क्षेत्र मेँ एक कालेज - बुध इला इण्टर कालेज ,ग्राम नवीरामकुनबी.यह कालेज उप्र के शाहजहांपुर जिला के कटरी क्षेत्र में स्थित था.इस क्षेत्र मेँ बंदूक उठा उठा वे लोग आते रहे जो शोषण व अन्याय के शिकार होते रहे और शासन प्रशासन भी जिसकी मदद न कर सका.आखिर श्वेतवसन अपराधियों पर कब रोक लग सकी?यह कटरी क्षेत्र नकल माफियाओं के लिए काफी चर्चित रहा है.यदुधन राज यादव जब विधायक बने तो उन्होंने नकल माफियाओं पर नकेल कस दी और नकल न होने दी लेकिन वे दुवारा अभी तक विधायक नहीं हुए.अनेक कालेज के सर्बेसर्बा धड़क धीर सिंह यादव विधायक होने लगे.बुध इला इंटर कालेज के जूनियर कक्षाओं हेतु चार अध्यापकों की नियुक्ति थी.जिनमें से एक अध्यापक थे-हरिकृष्ण कायस्थ.जूनियर कक्षाओं हेतु जब एड आयी तो इन अध्यापकों को छोंड़ कर अन्य अध्यापकों को इस प्रक्रिया मेँ शामिल कर लिया गया.चारों अध्यापकों में बेचैनी हुई लेकिन आगे कौन बढ़ा?हरिकृष्ण कायस्थ अकेला ही चल दिया.हिन्दू तो कोई उसके सहयोग में न आया कुछ मुस्लिम युवक जरुर उसके सहयोग मेँ आ गये थे...

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नक्सली कहानी:शिक्षा जगत के दंश

युवक हरिकृष्ण कायस्थ सारी रात जागता रहा था.

"किसी ने कहा है कि यदि मरने व मारने पर उतारु हो जाया जाये तो लक्ष्य पाया जा सकता है.समाज को एक मैसेज तो भेजा ही जा सकता है."

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: <varunjoshi2010@gmail.com>
Date: बुधवार, 3 अगस्त, 2011 8:32:04 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश लेखक : अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: <spntodaynews@gmail.com>
Date: शुक्रवार, 29 जुलाई, 2011 10:07:42 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश लेखक : अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: <go@blogger.com>
Date: मंगलवार, 19 अक्‍तूबर, 2010 8:04:46 अपराह्न GMT+0530
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश

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From: akvashokbindu@yahoo.in
To: akvashokbindu@yahoo.in
Sent: Tue, 19 Oct 2010 18:47 IST
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश

<ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'>

मनोज का एक मित्र था -केशव कन्नोजिया.


अभी एक दो वर्षोँ से ' माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा ,उ प्र ' के माध्यम से कुछ
अध्यापक,प्रधानाचार्य,आदि अपनी राजनीति करते नजर आ रहे थे.प्रदेश मेँ विप के स्नातक व शिक्षक क्षेत्रोँ का लिए चुनाव का वातावरण था.जिस हेतु 10नवम्बर 2010ई0 को मतदान होना तय था. वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापकोँ के साथ अंशकालीन शब्द जोड़ने वाले एक उम्मीदवार जो कि पहले सदस्य रह चुके थे,के खिलाफ थे वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक . जो कि
'माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा उप्र ' की ओर से उम्मीदवार संजय मिश्रा का समर्थन कर रहे थे.

लेकिन-


वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक,व्यक्तिगत स्वार्थ,निज स्वभाव, जाति वर्ग, प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की मनमानी,आदि के कारण अनेक गुट मेँ बँटे हुए थे.इन विद्यालयोँ मेँ अधिपत्य रहा है -प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की हाँ हजरी करने वाले व दबंग लोगोँ का.'सर जी' का कोई गुट न था.बस,उनका गुट था-अभिव्यक्ति.अब अभिव्यक्ति चाहेँ किसी पक्ष मेँ जाये या विपक्ष मेँ या अपने ही
विपक्ष मेँ चली जाये;इससे मतलब न था.

मनोज दो साल पहले कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात मेँ लिपिक पद पर कार्यरत था.जो कि फरीदपुर से मात्र 18 किलोमीटर पर था.मनोज को कुछ कारणोँ से प्रबन्ध कमेटी ने सेवा मुक्त कर दिया जो कि अब अदालत की शरण मेँ था.


फरीदपुर के रामलीला मैदान मेँ संजय मिश्रा के पक्ष मेँ हो रही एक सभा मेँ मनोज जा पहुँचा.


"अच्छा है कि आप सब वित्तविहीन विद्यालयी के अध्यापकोँ के भविष्य प्रति चिन्तित हैँ लेकिन यह चिन्ता कैसी?विद्यालय स्तर पर इन अध्यापकोँ के साथ जो अन्याय व शोषण होता है,उसके खिलाफ आप क्या कर सकते हैँ?आप स्वयं उन लोगोँ को साथ लेकर चल रहे हैँ जो कि विद्यालय मेँ ही निष्पक्ष न्याय सत्य अन्वेषण आदि के आधार पर नहीँ चलना चाहते हैँ.मैँ ....."


जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही बेहतर काम कर सकते हैँ तो हिँसा व भय क्या गलत है?गांधीवाद तो सभ्यता समाज मेँ चल सकता है.तुम लोग ही कहते हो कि भय बिन होय न प्रीति.लेकिन केशव कन्नौजिया को नक्सली बनाने के लिए कौन उत्तरदायी है?कानून,समाज,संस्था,आदि के ठेकेदार सुनते नहीँ.खुद यही कहते फिरते हैँ कि सीधी अँगुली से घी नहीँ निकलता तो फिर टेँड़ी अँगुली कर ली केशव ने तो क्या गलत
किया?सत्य को सत्य कहो,ऐसे नहीँ तो वैसे.


सन 1996ई0के जुलाई की बात है. यूपी सरकार के द्वारा अनेक जूनियर हाईस्कूल को एड दी गयी थी.केशव कन्नौजिया जिस विद्यालय मेँ अध्यापन कार्य कर रहा था , उस विद्यालय के जूनियर क्लासेज भी इस एड मेँ फँस रहे थे.जूनियर क्लासेज की नियुक्ति चार अध्यापकोँ की थी,जिनमेँ से एक केशव कन्नौजिया भी.
शेष 18 अध्यापक माध्यमिक मेँ थे.कानूनन उपरोक्त चार अध्यापक जो कि जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त थे,एड के अन्तर्गत थे.


लेकिन...


जिसकी लाठी उसकी भैस!...चित्त भी अपनी पट्ट भी अपनी,वर्चश्व अपना तो फिर क्या?


दो वर्ष पहले अर्थात सन 1994ई0 मेँ जब अध्यापकोँ का ग्रेड निर्धारित किया गया था तो भी नियति गलत,जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त चारोँ अध्यापकोँ को सीटी ग्रेड के बजाय एलटी ग्रेट मेँ रखा जा सकता था लेकिन कैसे , अपनी मनमानी?और अब जब जूनियर के लिए एड तो...?!


एड मेँ शामिल होने के लिए माध्यमिक से निकल जूनियर स्तर पर आ टिकने के लिए इप्रुब्ल करवा बैठे और जूनियर स्तर पर की नियुक्तियोँ को ताक पर रख दिया गया .


केशव कन्नौजिया इस पर तनाव मेँ आ गया कि हम सभी जूनियर की नियुक्ति पर काम करने वालोँ का क्या होगा ? जो जिस स्तर का है ,उसे उसी स्तर रहना चाहिए.ऊपर की कभी एड आयी तो क्या हम लोग ऊपर एड हो सकेँगे ? होँगे भी तो किस कण्डीशन पर ?


केशव कन्नौजिया अन्य जूनियर स्तर के लिए नियुक्त अध्यापकोँ के साथ हाई कोर्ट पहुँच गया.


अब उसे अनेक तरह की धमकियां मिलने लगी.


" मैँ शान्ति सुकून से अपने हक के लिए कानूनीतौर पर अपनी लड़ाई लड़ रहा हूँ,आपकी इन धमकियोँ से क्या सिद्व होता है?ईमानदारी से आप अब कानूनी लड़ाई जीत कर दिखाओ."



जब केस केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ के पक्ष मेँ जाते दिखा तो विपक्षी मरने मारने पर उतर आये.


"आप लोग कर भी क्या सकते हैँ ? भाई, आप लोग सवर्ण वर्ग से हैँ, यह कुछ ब्राह्मण वर्ग से हैँ. हम कहाँ ठहरे शूद्र.भाई,आप लोग अपने सवर्णत्व का ही तो प्रदर्शन करेँगे?और आप ब्राह्मणत्व का? शूद्रता का प्रदर्शन तो हम ही कर सकते हैँ?"

झूठे गवाहोँ के आधार पर केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ को क्षेत्र मेँ हुए मर्डर ,लूट,अपहरण,बलात्कार,आदि के केस मेँ फँसा दिया था.

नक्सली कहानी:शिक्षा जगत के दंश

युवक हरिकृष्ण कायस्थ सारी रात जागता रहा था.

"किसी ने कहा है कि यदि मरने व मारने पर उतारु हो जाया जाये तो लक्ष्य पाया जा सकता है.समाज को एक मैसेज तो भेजा ही जा सकता है."

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: <varunjoshi2010@gmail.com>
Date: बुधवार, 3 अगस्त, 2011 8:32:04 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश लेखक : अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: <spntodaynews@gmail.com>
Date: शुक्रवार, 29 जुलाई, 2011 10:07:42 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश लेखक : अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

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From: Ashok kumar Verma Bindu <akvashokbindu@yahoo.in>
To: <go@blogger.com>
Date: मंगलवार, 19 अक्‍तूबर, 2010 8:04:46 अपराह्न GMT+0530
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश

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From: akvashokbindu@yahoo.in
To: akvashokbindu@yahoo.in
Sent: Tue, 19 Oct 2010 18:47 IST
Subject: नक्सली कहानी:विद्यालयी दंश

<ASHOK KUMAR VERMA'BINDU'>

मनोज का एक मित्र था -केशव कन्नोजिया.


अभी एक दो वर्षोँ से ' माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा ,उ प्र ' के माध्यम से कुछ
अध्यापक,प्रधानाचार्य,आदि अपनी राजनीति करते नजर आ रहे थे.प्रदेश मेँ विप के स्नातक व शिक्षक क्षेत्रोँ का लिए चुनाव का वातावरण था.जिस हेतु 10नवम्बर 2010ई0 को मतदान होना तय था. वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापकोँ के साथ अंशकालीन शब्द जोड़ने वाले एक उम्मीदवार जो कि पहले सदस्य रह चुके थे,के खिलाफ थे वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक . जो कि
'माध्यमिक वित्तविहीन शिक्षक महासभा उप्र ' की ओर से उम्मीदवार संजय मिश्रा का समर्थन कर रहे थे.

लेकिन-


वित्तविहीन विद्यालयोँ के अध्यापक,व्यक्तिगत स्वार्थ,निज स्वभाव, जाति वर्ग, प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की मनमानी,आदि के कारण अनेक गुट मेँ बँटे हुए थे.इन विद्यालयोँ मेँ अधिपत्य रहा है -प्रधानाचार्य व प्रबन्धक कमेटी की हाँ हजरी करने वाले व दबंग लोगोँ का.'सर जी' का कोई गुट न था.बस,उनका गुट था-अभिव्यक्ति.अब अभिव्यक्ति चाहेँ किसी पक्ष मेँ जाये या विपक्ष मेँ या अपने ही
विपक्ष मेँ चली जाये;इससे मतलब न था.

मनोज दो साल पहले कन्हैयालाल इण्टर कालेज ,यदुवंशी कुर्मयात मेँ लिपिक पद पर कार्यरत था.जो कि फरीदपुर से मात्र 18 किलोमीटर पर था.मनोज को कुछ कारणोँ से प्रबन्ध कमेटी ने सेवा मुक्त कर दिया जो कि अब अदालत की शरण मेँ था.


फरीदपुर के रामलीला मैदान मेँ संजय मिश्रा के पक्ष मेँ हो रही एक सभा मेँ मनोज जा पहुँचा.


"अच्छा है कि आप सब वित्तविहीन विद्यालयी के अध्यापकोँ के भविष्य प्रति चिन्तित हैँ लेकिन यह चिन्ता कैसी?विद्यालय स्तर पर इन अध्यापकोँ के साथ जो अन्याय व शोषण होता है,उसके खिलाफ आप क्या कर सकते हैँ?आप स्वयं उन लोगोँ को साथ लेकर चल रहे हैँ जो कि विद्यालय मेँ ही निष्पक्ष न्याय सत्य अन्वेषण आदि के आधार पर नहीँ चलना चाहते हैँ.मैँ ....."


जब लोग हिँसा व भय मेँ रह कर ही बेहतर काम कर सकते हैँ तो हिँसा व भय क्या गलत है?गांधीवाद तो सभ्यता समाज मेँ चल सकता है.तुम लोग ही कहते हो कि भय बिन होय न प्रीति.लेकिन केशव कन्नौजिया को नक्सली बनाने के लिए कौन उत्तरदायी है?कानून,समाज,संस्था,आदि के ठेकेदार सुनते नहीँ.खुद यही कहते फिरते हैँ कि सीधी अँगुली से घी नहीँ निकलता तो फिर टेँड़ी अँगुली कर ली केशव ने तो क्या गलत
किया?सत्य को सत्य कहो,ऐसे नहीँ तो वैसे.


सन 1996ई0के जुलाई की बात है. यूपी सरकार के द्वारा अनेक जूनियर हाईस्कूल को एड दी गयी थी.केशव कन्नौजिया जिस विद्यालय मेँ अध्यापन कार्य कर रहा था , उस विद्यालय के जूनियर क्लासेज भी इस एड मेँ फँस रहे थे.जूनियर क्लासेज की नियुक्ति चार अध्यापकोँ की थी,जिनमेँ से एक केशव कन्नौजिया भी.
शेष 18 अध्यापक माध्यमिक मेँ थे.कानूनन उपरोक्त चार अध्यापक जो कि जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त थे,एड के अन्तर्गत थे.


लेकिन...


जिसकी लाठी उसकी भैस!...चित्त भी अपनी पट्ट भी अपनी,वर्चश्व अपना तो फिर क्या?


दो वर्ष पहले अर्थात सन 1994ई0 मेँ जब अध्यापकोँ का ग्रेड निर्धारित किया गया था तो भी नियति गलत,जूनियर क्लासेज के लिए नियुक्त चारोँ अध्यापकोँ को सीटी ग्रेड के बजाय एलटी ग्रेट मेँ रखा जा सकता था लेकिन कैसे , अपनी मनमानी?और अब जब जूनियर के लिए एड तो...?!


एड मेँ शामिल होने के लिए माध्यमिक से निकल जूनियर स्तर पर आ टिकने के लिए इप्रुब्ल करवा बैठे और जूनियर स्तर पर की नियुक्तियोँ को ताक पर रख दिया गया .


केशव कन्नौजिया इस पर तनाव मेँ आ गया कि हम सभी जूनियर की नियुक्ति पर काम करने वालोँ का क्या होगा ? जो जिस स्तर का है ,उसे उसी स्तर रहना चाहिए.ऊपर की कभी एड आयी तो क्या हम लोग ऊपर एड हो सकेँगे ? होँगे भी तो किस कण्डीशन पर ?


केशव कन्नौजिया अन्य जूनियर स्तर के लिए नियुक्त अध्यापकोँ के साथ हाई कोर्ट पहुँच गया.


अब उसे अनेक तरह की धमकियां मिलने लगी.


" मैँ शान्ति सुकून से अपने हक के लिए कानूनीतौर पर अपनी लड़ाई लड़ रहा हूँ,आपकी इन धमकियोँ से क्या सिद्व होता है?ईमानदारी से आप अब कानूनी लड़ाई जीत कर दिखाओ."



जब केस केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ के पक्ष मेँ जाते दिखा तो विपक्षी मरने मारने पर उतर आये.


"आप लोग कर भी क्या सकते हैँ ? भाई, आप लोग सवर्ण वर्ग से हैँ, यह कुछ ब्राह्मण वर्ग से हैँ. हम कहाँ ठहरे शूद्र.भाई,आप लोग अपने सवर्णत्व का ही तो प्रदर्शन करेँगे?और आप ब्राह्मणत्व का? शूद्रता का प्रदर्शन तो हम ही कर सकते हैँ?"

झूठे गवाहोँ के आधार पर केशव कन्नौजिया व उनके साथियोँ को क्षेत्र मेँ हुए मर्डर ,लूट,अपहरण,बलात्कार,आदि के केस मेँ फँसा दिया था.

Saturday, 6 August 2011

यति के साथ

आज से लगभग आठ करोड़ वर्ष पूर्व जब पृथुमहि पर वर्तमान मेँ उपस्थित हिमालय के स्थान पर सागर था.
सनडेक्सरन निवासी एक तीननेत्री अपने अण्डाकार यान से एक यति मानव के साथ पृथुमही की यात्रा पर था.
यह वह काल था जिसे जीवनशास्त्रियों,मानवशास्त्रियों,पुरातत्वविदों,आदि ने इस काल को अभिनूतन काल कहा है.

"आदम व हबबा के उत्त्पत्ति का स्थान हालांकि सउदी अरब या भूमध्यसागरीय प्रदेश था लेकिन ज्ञानी मानव का विस्तार का कारण तुम यति मानव होगे.सांतवें मनु के पूर्वज यति ही होंगे. "

यति खामोश थाय.

"आज यहाँ सागर है.भविष्य में यहां पर पर्वत होगा.इसका मूलस्थान ब्रहमदेश नाम से जाना जाएगा.जहाँ सूक्ष्म अनन्त शक्ति अंश विराजमान होकर मानव सभ्यता को पल्लवित व विकसित करने के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी.विभिन्न आत्माओं में बंट कर ब्रह्म यहीं बास करेगा.धरती के अन्य प्राणी स्थूल,भाव,सूक्ष्म,मनस भाग शरीर से मुक्त हो आत्मा मेँ प्रवेश कर यहीं से नियन्त्रित हों और धरती पर जन्म लेने वाली पूर्वजाग्रत आत्मा के मदद के लिए यहीं से सहायता को आत्माएं पहुंचेंगी.यति का शरीर धारण कर यहां आत्माएं स्थूल,भाव,सूक्ष्म व मनस मुक्त रहोगे "

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Friday, 5 August 2011

जन उपेक्षाओं के बिना लोकपाल निरर्थक

कांग्रेस के जनविरोधी लोकपाल के विरोध में रुकुम सिंह,विपिन गंगवार,रेहान बेग,अरुण कुमार,खुशीराम वर्मा ,राजेन्द्र प्रसाद ,सुजाता देवी शास्त्री, आदि ने अपने विचार रखे.कार्यक्रम का संचालन राजेन्द्र प्रसाद शर्मा व अध्यक्षता श्यामाचरन वर्मा ने की.

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From: akvashokbindu@gmail.com <akvashokbindu@gmail.com>
To: <akvashokbindu@yahoo.in>,<freelance@oneindia.co.in>
Date: शुक्रवार, 5 अगस्त, 2011 9:19:43 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: जन उपेक्षाओं के बिना लोकपाल निरर्थक लेखक : अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

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From: akvashokbindu@gmail.com <akvashokbindu@gmail.com>
To: "firozhindustan2010@gmail.com" <firozhindustan2010@gmail.com>,"shbkhartimes@gmail.com" <shbkhartimes@gmail.com>,"aajbareilly@gmail.com" <aajbareilly@gmail.com>,"speakoutedit@timesgrup.com" <speakoutedit@timesgrup.com>,"mudda@jagran.com" <mudda@jagran.com>
Date: शुक्रवार, 5 अगस्त, 2011 9:16:36 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: जन उपेक्षाओं के बिना लोकपाल निरर्थक लेखक : अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

(मीरानपुर कटरा)प्रजातन्त्र मेँ प्रजा का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप आवश्यक है और उसे विश्वास मेँ लिए बिना सरकारों के कार्य प्रजा का गला घोटने वाले हैँ.लोकपाल विधेयक पर जनता के अरमानों का गला घोट कर केन्द्र सरकार ने अपने प्रजातन्त्र विरोधी चरित्र को उजागर किया है.

केन्द्र सरकार द्वारा पेश किए गये लोकपाल विधेयक का विरोध करते हुए मानवता हिताय सेवा समिति उप्र के संस्थापक अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'ने बताया कि जनहित व देशहित से बढ़ कर कोई हित नहीं हो सकता.कांग्रेस के लोकपाल विधेयक ने यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस आम आदमी से हट कर कुछ मुट्ठी भर लोगों का हित चाहती है.जो सन 1947ई0 तक अंग्रेजों की हाँहजूरी करते रहे ,वे व उनके वंशज क्या कांग्रेस में बिल्कुल नहीं हैँ? सन 1947ई0 से लार्ड माउण्टबेटन की कृपा से कांग्रेस के चरित्र की उल्टी गिनती प्रारम्भ हो चुकी थी व गांधी कांग्रेस को भंग करना चाहते थे वो तो यहां की जनता कूपमंडूक है जो कि वह कांग्रेस की असलियत को जानना ही नहीं चाहती या जान कर भी निजस्वार्थ में कांग्रेस को वोट देती आयी है....अब "जिसका अन्ना को समर्थन नहीं उसको वोट नहीं" पर चलना होगा.

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Monday, 1 August 2011

कांवरियों कहां है - धर्म?

हम बचपन से धार्मिक होने की कोशिस कर रहे हैं लेकिन अभी तक धार्मिक हो नहीं पाये है . हमेँ तजुब्ब होता है धार्मिकों की पूरी की पूरी भीड़ देख कर,इतने लोग धार्मिक?लेकिन तब भी देश मेँ भ्रष्टाचार व कुप्रबन्धन?इन दिनों कांवरियों की अच्छी खासी भीड़ सड़कों पर नजर आ जाती है.हमेँ ताज्जुब है कि ये कांवरिये धार्मिक हैं?हमेँ कोई भी धार्मिक नजर नहीं आया है . जरुर मेरी दृष्टि मेँ खोट है?ऐसा हो नहीं सकता कि एक भी धार्मिक न हो?

"धृति क्षमादमास्तेयमशौचममिन्द्रिय निग्रह

धीर्विद्यासत्यमक्रोधो दशकम धर्म लक्षणम. "


न जाने क्यों हम अभी तक महापुरुषों व ग्रन्थों से सीख लेते रहे लेकिन अभी तक धार्मिक नहीं हो पाये.और ये चलते फिरते धार्मिक किसी महापुरुष व किसी ग्रन्थ पर शोध दृष्टि नहीं रखते,जिसे सहयोग की जरुरत हो उसे सहयोग नहीं दे सकते,निर्जीव के लिए सजीव का अस्तित्व ही समाप्त कर देते हैं.... ऐसा हम नहीं कर सकते . तो हम काहे को धार्मिक?मै धर्मस्थलों इन पंथों से हट निर्गुण पंथ पर !
शेष फिर .......


अशोक कुमार वर्मा 'बिन्दु'

विविध कला प्रकोष्ठ

आदर्श बाल विद्यालय इ. कालेज,

मी. पु. कटरा,

शाहजहाँपुर, उ.प्र.

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Saturday, 30 July 2011

यमुनादत्त वैष्णव 'अशोक':एक संक्षिप्त परिचय

दक्षिणी भारत,प्राचीन सुमेर,मिश्र और भूमध्य सागर देशों की मौलिक सांस्कृतिक समानता के अध्ययन क्षेत्र मेँ यमुनादत्त वैष्णव 'अशोक' का नाम चिरस्मरणीय रहेगा.
इनका जन्म कौसानी (अल्मोड़ा) के निकट ग्राम धौलरा मेँ 02अक्टूबर1915ई को हुआ था.

युनेस्को द्वारा कुमाऊंनी शब्दकोष के अन्तर्राष्ट्रीय महत्व को देखते हुए कोष निर्माण अनुबन्ध के लिए एशिया और प्रशान्त क्षेत्र के मुख्यालय बैंकाक का आमंत्रण .

कोष निर्माण के लिए युनेस्को को साझेदारी का अनुबन्ध और वित्तीय सहायता.

बैंकाक की यात्रा के दौरान "थाइलैण्ड की अयोध्या" शीर्षक 12 लेखों के ग्रन्थ का प्रणयन.


मार्च1989को 75वर्ष पूरे होने पर 02अक्टूबर सन 1990 को नैनीताल के बुद्धिजीवियोँ द्वारा अभिनन्दन तथा उनके ग्रन्थ "पुरस्कृत विज्ञान कथा साहित्य" का लोकार्पण .

सन 1990ई0 तक इनके द्वारा 34 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं.जिनमेँ -विज्ञान कथा साहित्य ,15 उपन्यास, 07 कथा संग्रह ,08 हिन्दी विज्ञान साहित्य, 05 संस्कृति और इतिहास .

यह कुमाऊं संस्कृति परिषद ,नैनीताल के अध्यक्ष भी रहे.उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा 'द्रविण और विश्व मानवता'ग्रन्थ पर संस्कृति पुरस्कार से सम्मानि किया गया.

इण्डोकैस्पियन(आदि द्रविड़)संस्कृति पर यरुशलेम अन्तर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी सम्मेलन मेँ मार्च अप्रैल 1985ई0 में मध्यपूर्व,मिश्र व रोम की यात्रा.

प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन नागपुर मेँ जनवरी 1975 मेँ 'कुमाऊंनी और अन्तर्राष्ट्रीय रोमनी (जिप्सी) भाषा'की समानता पर पढ़ा गया निबन्ध.

कांग्रेसी दंश : कांग्रेस का काला पृष्ठ

सन 1946ई के अन्त के साथ कांग्रेस के चरित्र की उल्टी गिनती शुरु हो चुकी थी.भारत के कुछ बिकने वालों के सहयोग से इस देश पर विदेशी मंसूबे फलते फूलते रहे हैँ . देश की वर्तमान कंडीशन के लिए दोषी कौन?दादूपुर,वाराणसी के सरस्वती कुमार के अनुसार इसके लिए जिम्मेदार है -"बेटन नेहरु पैक्ट यानी वशीकरण अभियान ". पहला कांग्रेसी दंश था-गांधी के न चाहने के बाबजूद देश का विभाजन . इसके बाद तो कांग्रेस से दंशना प्रारम्भ कर दिया था.जो अभी तक अंग्रेजों की हाँ हजूरी करते थे वे अब कांग्रेस पार्टी का टिकिट लेकर एमपी विधायक थे.और पब्लिक भी मूर्ख?इन्हें ही जिताते आयी.प्रजातन्त्र मेँ प्रजा को ही दोषी मानता हूँ.जो नेता दोषी हैं आखिर उन्हे चुनती तो पब्लिक है? कांग्रेस अनेक मौकों पर प्रजातन्त्र के खिलाफ नजर आयी है. वर्तमान मेँ भ्रष्टाचार व लोकपाल पर कांग्रेस का नजरिया सब जान गये है लेकिन धन्य भारत की पब्लिक...?कांग्रेस की सीटेँ क्या अगले चुनाव मेँ शून्य हो जायेंगी?लोकपाल पर पब्लिक की सहमति को अनसुना कर अन्ना को एक पत्र मेँ पागल तक कह डाला . जीतने के लिए कांग्रेस को वोट चाहिए?अन्ना के मुट्ठी मेँ कितने वोट....?


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Friday, 29 July 2011

पाकिस्तान से हिना रब्बानी खार...

पाक एक ओर भारत से बात कर रहा है वहीं दूसरी ओर वह भारतीयों पर गोली व बम दाग रहा होता है.इस समय पाकिस्तान की पहली महिला विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के चर्चे मीडिया मेँ हैँ ही इण्टरनेट पर भी हैँहिना की खूबसूरती के भी काफी चर्चे हैँ.वास्तव मेँ पाक एशिया मेँ शान्ति चाहता है तो उसे भारत के दर्द को समझना होगा.आतंक के खिलाफ जाति मजहब से ऊपर उठ कर अभियान चलाना होगा.कट्टरपंथियों के अरमानों को ठंडा करना होगा.पाक अफगान उत्तरभारत बांग्लादेश आदि को मिला कर मुगलस्तान की वकालत करने वालों को कठोर जबाब दे कर यदि हिंद महादीप के देशों का संघ बना कर एक संघीय सरकार,मुद्रा व सेना की वकालत का माहौल बनाना चाहिए.पड़ोसियों का ख्याल यदि पड़ोसी न रखेँ तो यह क्षेत्र के लिए ठीक नहीं.


बड़ा ओछा हिन्दुस्तान!हिना की सुन्दरता से क्या लेना देना ?लेकिन खूब चर्चा उसके सुन्दरता की.भाई ये आध्यात्मिक व धार्मिक देश है.यहाँ शारीरिक सुन्दरता से मतलब.

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पाकिस्तान से हिना रब्बानी खार...

पाक एक ओर भारत से बात कर रहा है वहीं दूसरी ओर वह भारतीयों पर गोली व बम दाग रहा होता है.इस समय पाकिस्तान की पहली महिला विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार के चर्चे मीडिया मेँ हैँ ही इण्टरनेट पर भी हैँहिना की खूबसूरती के भी काफी चर्चे हैँ.वास्तव मेँ पाक एशिया मेँ शान्ति चाहता है तो उसे भारत के दर्द को समझना होगा.आतंक के खिलाफ जाति मजहब से ऊपर उठ कर अभियान चलाना होगा.कट्टरपंथियों के अरमानों को ठंडा करना होगा.पाक अफगान उत्तरभारत बांग्लादेश आदि को मिला कर मुगलस्तान की वकालत करने वालों को कठोर जबाब दे कर यदि हिंद महादीप के देशों का संघ बना कर एक संघीय सरकार,मुद्रा व सेना की वकालत का माहौल बनाना चाहिए.पड़ोसियों का ख्याल यदि पड़ोसी न रखेँ तो यह क्षेत्र के लिए ठीक नहीं.


बड़ा ओछा हिन्दुस्तान!हिना की सुन्दरता से क्या लेना देना ?लेकिन खूब चर्चा उसके सुन्दरता की.भाई ये आध्यात्मिक व धार्मिक देश है.यहाँ शारीरिक सुन्दरता से मतलब .

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देशभक्ति की परिभाषा पर पुनर्विचार हो !

देश का दुश्मन दुश्मन है,चाहेँ वह विदेशी हो या स्वदेशी . देश के दुश्मनों के साथ मनमानी क्योँ ?विदेशी दुश्मन को गोली लेकिन स्वदेशी दुश्मन को गोली पर कभी वह हमारा रिश्तेदार कभी अपनी बिरादरी का कभी अपने मजहब का नजर आता है.और मिट जाता है अपना धर्म व सत.ईमान पर पक्का होने का मतलब तब क्या रह जाता है?सम्पूर्ण मनुष्य जाति व देश के लिए न सोंच एक विशेष जाति पंथ के लिए सोंचना व जीना
मनुष्य का ईमान नहीं हो सकता ,हाँ ! किसी मजहबी का ईमान हो सकता. अफगान मेँ तालिबान से लड़ रहे सैनिकोँ को अमेरिका कुरुशान(गीता)का पाठ सिखा सकता है लेकिन हम नहीँ सीख सकते.देश के दुश्मनों के साथ दोहरा मापदण्ड क्योँ?जाति सम्प्रदाय से ऊपर उठ कर 'धर्म का पथ' अर्थात 'जेहाद की राह' को समझो . काफिर वह है जो सत्य से मुकरे.जो व्यक्ति काफिर के काफिर आदतों का समर्थन करता है,मेरी दृष्टि मेँ वह
भी काफिर है.सीख लेना चाहेँ तो हम फिल्मों से सीख ले सकते हैँ,जिसमेँ भ्रष्ट नेता मंत्री पुलिस अफसर आदि के खिलाफ मरते दम तक नायक अभियान छेंड़े रखता है.एक फिल्म मेँ डायलाग है -'कानून का कोई अपना भाई नहीँ होता.' गीता मेँ कृष्ण क्या कहते हैँ?भूल गये क्या?धर्म के रास्ते पर न कोई अपना न कोई पराया होता है.हम क्या देशभक्त नहीँ हैँ?यदि नहीँ तो क्या हमेँ सरकारी सुविधाएं मिलना चाहिए?देश
के दुश्मनों के खिलाफ अभियान क्यों नहीँ?हम क्योँ जाति सम्प्रदाय मेँ बंट कर रह जाते हैँ?भ्रष्टाचार व काला धन पर आवाज उठाने वालों पर लाठियां गोलियां व कानूनी अड़चने लगाने वालों के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीँ?

गौरवशाली भारत का अस्तित्व क्यों मिटा?सिर्फ हमारे व पूर्वजों के नजरिया के कारण.जो अंग्रेजों की हाँहजूरी करते रहे अंग्रेज चले गये तो वही देश संभालने लगे.बच्चों को टीवी सिनेमा मोबाइल आदि रुपी झुनझुना पकड़ा दिये गये .

देशभक्ति की परिभाषा पर पुनर्विचार होना चाहिए.विभिन्न पदों पर नियुक्ति व प्रत्याशी चयन के लिए नारको परीक्षण आदि व विधि साक्षरता अनिवार्य किया जाना चाहिए .अफसोस कि लोग संविधान की एबीसी तक नहीं जानते,उन्हेँ संविधान की शपथ दिलवायी जाती है.

Thursday, 28 July 2011

गांधी को क्या नेहरु ने मरवाया : सिर्फ एक कल्पना

गांधी की हत्या ने पूरे देश मेँ खलवली मचा दी.पब्लिक विवश हो कर सिर्फ मुट्ठियां बांध कर खींच कर रह गयी.देशभक्त जनता नेहरु व जिन्ना का पीछे चल पड़ी जनता के बीच दब कर रह गयी थी.दिल्ली मेँ जनता का सैलाब उमड़ पड़ा था.
"बेचारे महात्मा को नेहरु ने सत्ता के लोभ मेँ आकर मरवा ही दिया."-भीड़ मेँ एक ओर से आवाज आयी तो एक युवक बौखला उठा-"कौन बोला?कौन बोला?साला अब क्यों नहीं बोलता?"एक मुस्लिम वृद्ध एक अधेड़ तिलकधारी देखकर बोला -"मैने बोला है , मैने बोला है." मुस्लिम वृद्ध को पकड़ कर झकझोरते हुए-"यें..., नेहरु ने मारा गांधी को...?"


रायसेन मध्यप्रदेश से एक बालक अकेले ही दिल्ली आया हुआ था.जिसको देख कर कभी गांधी बोले थे-"दुनिया मेँ यही बालक है मेरे टक्कर का."इधर-मौ.अबुल कलाम आजाद एक कमरे में बैठे लिखने मेँ व्यस्त थे.गांधी का अन्तिम संस्कार हुए दो दिन गुजर चुके हैं लेकिन-सत्तावादी गांधी की मौत पर सिर्फ घड़ियाली आंसू बहा रहे हैँ.मेरे द्वारा लिखी जाने वाली पुस्तक 'India Wins Freedom'जब प्रकाशित होकर जनता के बीच जायेगी तो शायद देश जिन्ना,पटेल व नेहरु की असलियत समझ सके?और नेहरु व अब के बाद की कांग्रेस को ...


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गजवा ए हिंद की भारत मेँ चुनौती

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To: "spntodaynews@gmail.com" <spntodaynews@gmail.com>
Date: गुरुवार, 28 जुलाई, 2011 8:37:15 पूर्वाह्न GMT+0000
Subject: गजवा ए हिंद की भारत मेँ चुनौती

भारत के खिलाफ भड़काऊ बयान देने वाले जमात उद दावा के प्रमुख हाफिज मुहम्मद सईद ने अब जम्मू कश्मीर के जरिये भारत मेँ घुसने का एलान किया है.आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा के संस्थापक सईद ने कहा कि हम कश्मीर के रास्ते भारत मेँ घुस कर गजवा ए हिंद छेंड़ेंगे.उसका दावा है कि भारत व इजरायल ने गुप्त समझौता किया है. इधर भारत मेँ परसों से ही इण्टरनेट पर कमेण्टस आ रहे हैँ.एक ने लिखा है कि तुम भारत आओ तुमसे निपट लिया जायेगा लेकिन कांग्रेसियों से कैसे निपटा जाये ?मैं इतिहास का अध्ययन करता रहा हूँ मुझे तो भारतीय ही दोषी नजर आये हैं.देश के अन्दर की कमजोरी का फायदा विदेशी शक्तियाँ उठाती रही हैं.
कभी तुर्क तो कभी मुगल तो कभी अंग्रेज तो कभी पाकिस्तान तो कभी आतंकवाद हमारे लिए दोषी नजर आता रहा है.लेकिन अपने परिवार ,जाति ,पंथ राज्य ,देश,समाज के ठेकेदारों व अपनी सोंच की ओर न देखा.
हम अपने लिए औरअधिकतम अपने परिवार के लिए जीते आये है.समाज व देश के लिए हमारा कोई लक्ष्य नहीं रहा है . दुनियां में जो भी कौमेँ आगे बढ़ी है,उन कौम के लोगों नेअपनी कौम के लिए भी त्याग किए हैँ.सईद तुम भारत आओ,लेकिन भारतीयों का दिल जीतने.

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Tuesday, 26 July 2011

'छोटे शहर का बड़ा रंगमंच' का विमोचन : 25जुलाई 2011ई0

शाहजहांपुर की नाट्य संस्थाओं व रंगकर्मियों के योगदान पर साहित्यकार 'सुशील मानव' की पुस्तक 'छोटे शहर का बड़ा रंगमंच' का विमोचन किया गया.


रविवार को गांधी भवन मेँ हुए कार्यक्रम मेँ पालिकाध्यक्ष तनवीर खाँ व स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बसंत लाल खन्ना ने पुस्तक का विमोचन किया.

इस अवसर पर साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी लेखक इंजी.राजेश कुमार शमीम आजाद कृष्ण कुमार श्रीवास्तव आदि सहित कला व साहित्य जगत से जुड़े तमाम लोग मौजूद थे.


शहीदों की नगरी नाम से पुकारा जाने वाला रुहेलखण्ड का प्रसिद्ध नगर शाहजहांपुर आज अनेक क्षेत्रों मेँ चर्चित है.इस पुस्तक के विमोचन के साथ यहाँ के रंगमंच मेँ एक नया अध्याय जुड़ गया है.रंगमंच से ही अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले अनेक कलाकार यहां से निकल कर दुनिया मेँ शाहजहांपुर का नाम रोशन कर रहे हैँ.

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